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<title>Rohtak Media | A Media News Platform Of Rohtak City | RohtakMedia.com &#45; : Religion</title>
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<description>Rohtak Media | A Media News Platform Of Rohtak City | RohtakMedia.com &#45; : Religion</description>
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<title>बेरी में नवरात्र पर आज से भव्य मेला:प्रशासन के पुख्ता प्रबंध, उमड़ेगी लाखों की भीड़</title>
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<description><![CDATA[ झज्जर जिले के बेरी कस्बे में आज से नवरात्र मेले का शुभारंभ हो गया है। बेरी स्थित मां भीमेश्वरी देवी मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है, जहां नवरात्रों के दौरान लाखों भक्त दर्शन करने पहुंचते हैं। हालांकि आज से मेले की शुरुआत है और भीड़ अंतिम तीन दिन में उमड़ेगी। लोगों की सुरक्षा के लिए बेरी में प्रशासन और पुलिस ]]></description>
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<pubDate>Mon, 22 Sep 2025 08:08:05 +0530</pubDate>
<dc:creator>Latest News</dc:creator>
<media:keywords>झज्जर जिले के बेरी कस्बे, नवरात्र मेले का शुभारंभ हो गया है, बेरी स्थित मां भीमेश्वरी देवी मंदिर, श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र, लाखों भक्त दर्शन करने पहुंचते हैं, मां भीमेश्वरी देवी, प्रशासन के पुख्ता प्रबंध</media:keywords>
<content:encoded><![CDATA[<p>झज्जर जिले के बेरी कस्बे में आज से नवरात्र मेले का शुभारंभ हो गया है। बेरी स्थित मां भीमेश्वरी देवी मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है, जहां नवरात्रों के दौरान लाखों भक्त दर्शन करने पहुंचते हैं। हालांकि आज से मेले की शुरुआत है और भीड़ अंतिम तीन दिन में उमड़ेगी। लोगों की सुरक्षा के लिए बेरी में प्रशासन और पुलिस की ओर से भी पुख्ता प्रबंध किए गए हैं।</p>
<p>धर्मनगरी बेरी में मां भीमेश्वरी देवी मंदिर परिसर में आश्विन माह लगने वाले दुर्गा नवरात्रि मेला आज सोमवार से पहले नवरात्र से ही शुरू हो गया है ,मुख्य मेला 28 से 30 सितंबर को होगा। नवरात्र पर लोग मां भीमेश्वरी देवी के दर्शन करने के लिए बेरी के मंदिर में आते हैं और माथा टेक माता से मन्नतें मांगते हैं। बेरी में माता के दो मंदिर हैं जिनमें दोनों में ही भक्तों को अलग अलग समय अनुसार दर्शन होते हैं।</p>
<p>पुलिस सुरक्षा के बीच मां भीमेश्वरी देवी की प्रतिमा को मंदिर पुजारी एक स्थान से दूसरे स्थान पर लेकर जाते हैं। नवरात्र के अंतिम तीन दिन लगेगी भीड़ नवरात्र मेले का मुख्य आयोजन अंतिम तीन दिनों में होता है, जब यहां भारी भीड़ उमड़ती है। इसी को देखते हुए प्रशासन और पुलिस अलर्ट मोड पर हैं। इस बार फिलहाल 40 अतिरिक्त पुलिसकर्मियों की ड्यूटी लगाई गई है, जबकि मुख्य मेले के दौरान 500 से अधिक पुलिसकर्मी सुरक्षा व्यवस्था संभालेंगे।</p>
<p>सफाई पर विशेष ध्यान श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए प्रशासन की ओर से पार्किंग और अन्य इंतजाम भी किए गए हैं। खास बात यह है कि मंदिर परिसर में बच्चों के मुंडन संस्कार (पहली बार बाल उतारने) के लिए अलग स्थान की व्यवस्था की गई है। वहीं प्रशासन की ओर से मेले में प्लास्टिक की थैलियों का प्रयोग करने पर रोक लगाई है। साथ ही प्रशासन की ओर से मंदिर परिसर में सफाई व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया गया है।</p>]]> </content:encoded>
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<title>बेरी में नवरात्र मेले में उमड़ेगी लाखों की भीड़:22 से 30 सितंबर बेरी मंदिर में लगेगा नवरात्रि मेला, प्रशासन तैयारियों में जुटा</title>
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<description><![CDATA[ झज्जर जिले के बेरी में स्थित मां भीमेश्वरी देवी मंदिर में नवरात्र मेले को लेकर तैयारियां जोरों पर हैं। 22 से 30 सितंबर तक बेरी मंदिर परिसर में मेले का आयोजन होगा। मेले को लेकर अधिकारी भी बैठक कर चुके हैं। वहीं बेरी मेले में आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा को लेकर भी तैयारियां कर ली गई हैं। मुख्य मेला नवरात्र के अंतिम तीन दिन ]]></description>
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<pubDate>Thu, 11 Sep 2025 07:44:49 +0530</pubDate>
<dc:creator>Latest News</dc:creator>
<media:keywords>झज्जर जिले के बेरी में स्थित, मां भीमेश्वरी देवी मंदिर, नवरात्र मेले को लेकर तैयारियां जोरों पर, 22 से 30 सितंबर तक बेरी मंदिर परिसर में मेले का आयोजन होगा, श्रद्धालुओं की सुविधा, एडीसी जगनिवास, ड्यूटी मजिस्ट्रेट भी नियुक्त किए जाएंगे</media:keywords>
<content:encoded><![CDATA[<p>झज्जर जिले के बेरी में स्थित मां भीमेश्वरी देवी मंदिर में नवरात्र मेले को लेकर तैयारियां जोरों पर हैं। 22 से 30 सितंबर तक बेरी मंदिर परिसर में मेले का आयोजन होगा। मेले को लेकर अधिकारी भी बैठक कर चुके हैं। वहीं बेरी मेले में आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा को लेकर भी तैयारियां कर ली गई हैं। मुख्य मेला नवरात्र के अंतिम तीन दिन रहेगा। इस मेले में लाखों की भीड़ मां भीमेश्वरी देवी मंदिर में दर्शन करने के लिए आती है।</p>
<p> प्रशासन की ओर से भी मेले के आयोजन को लेकर तैयारियां की जा रही हैं। बेरी के मंदिर में हर बार मेले में लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं और अपनी मन्नतें मांगते हैं। नवरात्र के दौरान बेरी में लगातार 9 दिन तक मेले का आयोजन होता है और दूसरे राज्यों से भी लोग मां भीमेश्वरी देवी के दर्शन करने आते हैं। बैठक कर एडीसी जगनिवास द्वारा मेले की तैयारियों को लेकर अधिकारियों को निर्देश दे दिए गए हैं।</p>
<p>बेरी मेले को लेकर प्रशासन इंतजाम में जुटा बेरी मेले में सप्तमी और अष्टमी के दिन मां भीमेश्वरी देवी के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। साथ ही पार्किंग, सुरक्षा, पीने के पानी, रात्रि के समय रोशनी के इंतजाम, स्वास्थ्य सुविधाएं, अस्थाई शौचालय, सीसीटीवी, माइक सर्विस, अग्निशमन सेवाएं आदि इंतजामों की व्यवस्था को लेकर पहले हो चुकी बैठकों में निर्देश दिए जा चुके हैं। श्रद्धालुओं की उमड़ने वाली भीड़ को लेकर कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए ड्यूटी मजिस्ट्रेट भी नियुक्त किए जाएंगे।</p>]]> </content:encoded>
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<title>माता मनसा देवी श्राइन बोर्ड की बैठक &#45; काशी विश्वनाथ कॉरिडोर की तर्ज पर होगा मंदिर का विस्तार</title>
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<description><![CDATA[ मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की अध्यक्षता में माता मनसा देवी श्राइन बोर्ड की बैठक हुई। इस बैठक में माता मनसा देवी परिसर में चल रहे विकास कार्यों का मुख्यमंत्री ने रिव्यू किया। आगामी नवरात्रि को लेकर भी जरूरी इंतजामों की भी मुख्यमंत्री ने समीक्षा की। इस बैठक में यूएलबी मिनिस्टर विपुल गोयल, पूर्व स्पीकर ज्ञानचंद गुप्ता ]]></description>
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<pubDate>Wed, 10 Sep 2025 08:15:30 +0530</pubDate>
<dc:creator>Latest News</dc:creator>
<media:keywords>माता मनसा देवी, श्राइन बोर्ड की बैठक, हरियाणा CM ने काम का फीडबैक लिया, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर की तर्ज पर होगा मंदिर का विस्तार, यूएलबी मिनिस्टर विपुल गोयल, बीजेपी विधायक शक्ति रानी, 108 फीट ऊंची हनुमान जी की मूर्ति, हनुमान वाटिका</media:keywords>
<content:encoded><![CDATA[<p>मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की अध्यक्षता में माता मनसा देवी श्राइन बोर्ड की बैठक हुई। इस बैठक में माता मनसा देवी परिसर में चल रहे विकास कार्यों का मुख्यमंत्री ने रिव्यू किया। आगामी नवरात्रि को लेकर भी जरूरी इंतजामों की भी मुख्यमंत्री ने समीक्षा की।</p>
<p> इस बैठक में यूएलबी मिनिस्टर विपुल गोयल, पूर्व स्पीकर ज्ञानचंद गुप्ता और कालका से बीजेपी विधायक शक्ति रानी शर्मा मौजूद रहीं। दरअसल, माता मनसा देवी मंदिर, पंचकूला के श्री माता मनसा देवी श्राइन बोर्ड (SMMDSB) द्वारा विकास कार्य किए जा रहे हैं, जिनमें काशी विश्वनाथ कॉरिडोर की तर्ज पर मंदिर का विस्तार, "शक्ति पथ" का निर्माण, 108 फीट ऊंची हनुमान जी की मूर्ति वाली हनुमान वाटिका की स्थापना और एक मल्टी-लेवल पार्किंग का निर्माण शामिल है।</p>
<p>अधिकारी तय समय में पूरा करें काम सीएम नायब सैनी ने बैठक में अधिकारियों से पहले और दूसरे फेज के हुए और चल रहे निर्माण कार्यों का अपडेट लिया। इसके अलावा बचे हुए कामों को जल्द से जल्द पूरा करने के भी निर्देश दिए। सीएम ने नवरात्रों की तैयारियों को लेकर भी जानकारी ली। सीएम ने मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं को किसी भी तरह की कोई दिक्कत नहीं होने की अधिकारियों को हिदायत दी।</p>
<p>यहां पढ़िए क्या क्या हो रहे निर्माण कार्य... पहले फेज में हो रहा ये काम मंदिर को भव्य बनाने और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए काशी विश्वनाथ कॉरिडोर की तर्ज पर विकास किया जा रहा है। पहले चरण में शक्ति द्वार से मुख्य मंदिर तक 110 मीटर लंबा और 15 मीटर चौड़ा एक विशेष "शक्ति पथ" तैयार किया जा रहा है, जिसमें बेंच, लिफ्ट और सीढ़ियां होंगी। दूसरे फेज में 108 फिट ऊंची प्रतिमा लगेगी</p>
<p>दूसरे चरण में, 108 फीट ऊंची हनुमान जी की मूर्ति वाली वाटिका बनाई जा रही है, जो एक किलोमीटर दूर से भी दिखाई देगी। श्री माता मनसा देवी श्राइन बोर्ड द्वारा मंदिर परिसर में मल्टी-लेवल पार्किंग का निर्माण भी किया जाएगा, जिसकी घोषणा हुई है। ओल्ड ऐज होम भी बन रहा परिसर में 7.50 करोड़ रुपए की लागत से ओल्ड एज होम का भवन बनकर तैयार हो चुका है, जिसे जल्द ही शुरू किया जाएगा। इसके अलावा हरियाणा सरकार ने मंदिर परिसर में संस्कृत को बढ़ावा देने के लिए एक संस्कृत महाविद्यालय खोलने का भी निर्णय लिया है।</p>]]> </content:encoded>
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<title>रोहतक में शोभायात्रा के साथ आज स्थापित होंगी गणेश प्रतिमा:शहर में निकाली जाएंगी कलश यात्रा, मिट्टी की प्रतिमा रहेंगी आकर्षण</title>
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<description><![CDATA[ रोहतक में गणेश उत्सव की धूम शुरू हो गई है। शहर में अनेक स्थानों पर गणेश प्रतिमाओं की स्थापना पूरे विधि विधान के साथ की जाएगी। गणेश पंडालों में पीओपी की बजाय मिट्टी से बनी प्रतिमाओं का आकर्षण देखने को मिलेगा। वहीं, लोगों में भी गणेश उत्सव को लेकर जोश देखने को मिल रहा है।  मूर्ति स्थापना से पूर्व शहर में ]]></description>
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<pubDate>Wed, 27 Aug 2025 07:29:09 +0530</pubDate>
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<media:keywords>रोहतक में गणेश उत्सव की धूम, आज स्थापित होंगी गणेश प्रतिमा, शहर में निकाली जाएंगी कलश यात्रा, मिट्टी की प्रतिमा रहेंगी आकर्षण, मूर्ति स्थापना</media:keywords>
<content:encoded><![CDATA[<p>रोहतक में गणेश उत्सव की धूम शुरू हो गई है। शहर में अनेक स्थानों पर गणेश प्रतिमाओं की स्थापना पूरे विधि विधान के साथ की जाएगी। गणेश पंडालों में पीओपी की बजाय मिट्टी से बनी प्रतिमाओं का आकर्षण देखने को मिलेगा। वहीं, लोगों में भी गणेश उत्सव को लेकर जोश देखने को मिल रहा है। मूर्ति स्थापना से पूर्व शहर में अनेक स्थानों पर कलश यात्रा निकाली जाएंगी, जिसमें हजारों महिलाएं शामिल होंगी।</p>
<p>शहर में कई स्थानों पर बड़े पंडाल बनाए गए हैं, जिनमें अधिकतम 9 फुट ऊंची मिट्टी की गणेश प्रतिमा को स्थापित किया जाएगा। वहीं, पंडालों को किसी न किसी थीम को आधार बनाकर सजाया गया है, जिसपर लाखों रुपए खर्च किए गए हैं। 78 संघ परिवार ने देर रात निकाली शोभायात्रा 78 संघ परिवार की तरफ से दुर्गा भवन में गणेश उत्सव मनाया जा रहा है, जिसके लिए रात को शहर में गणेश प्रतिमा के साथ शोभायात्रा निकाली गई।</p>
<p>शोभायात्रा का शुभारंभ पूर्व मेयर मनमोहन गोयल व राजेश जैन ने किया। 78 संघ परिवार की तरफ से 9 फुट ऊंची गणेश प्रतिमा की स्थापना की जाएगी। साथ ही 1100 कलश मूर्ति स्थापना के साथ ही पंडाल में रखे जाएंगे। सुरक्षा के लिए पंडाल में सीसीटीवी लगाए गए हैं। समर्पण यूथ क्लब का हुडा कॉम्प्लेक्स में सजा पंडाल समर्पण यूथ क्लब की तरफ से गणेश उत्सव को लेकर भाजपा कार्यालय के सामने हुडा कॉम्प्लेक्स में पंडाल को सजाया गया है।</p>
<p>मूर्ति स्थापना से पूर्व आयोजकों की तरफ से कलश यात्रा निकाली जाएगी, जो हुडा कॉम्प्लेक्स के चारों तरफ का भ्रमण करते हुए पंडाल में संपन्न होगी। इसके बाद मूर्ति को स्थापित किया जाएगा। पुरानी अनाज मंडी में रामसेवा मंडल करेगा मूर्ति स्थापना पुरानी अनाज मंडी में गणेश उत्सव को लेकर भव्य पंडाल बनाया गया है। रामसेवा मंडल की तरफ से पुरानी अनाज मंडी में रामलीला की स्टेज पर मुख्य दरबार बनाया है, जहां गणेश की प्रतिमा को स्थापित किया जाएगा। पूरे पंडाल में आकर्षक लाइट व फूल लगाए गए हैं, जो लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करेंगे।</p>]]> </content:encoded>
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<title>40 मिनट में दिखेगा कश्मीर का कुरुक्षेत्र से कनेक्शन:स्टेज&#45;शो में कलाकार दिखाएंगे कश्मीर द्वापर से भारत का अटूट अंग; कार्यक्रम में सीएम मुख्यातिथि</title>
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<description><![CDATA[ हरियाणा के कुरुक्षेत्र में कश्मीरी हिंदू प्रकोष्ठ की ओर से गीता ज्ञान संस्थानम् में कुरुक्षेत्र-कश्यप तीर्थाटन-2025 कार्यक्रम का आयोजन होगा। इस कार्यक्रम को कश्मीर में धर्म की पुन: स्थापना और कश्मीरी हिंदुओं के पुनर्वास की कामना के निमित्त किया जा रहा है। कार्यक्रम में सीएम नायब सिंह सैनी मुख्यातिथि होंगे। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 24 Aug 2025 07:54:59 +0530</pubDate>
<dc:creator>Latest News</dc:creator>
<media:keywords>कश्मीर का कुरुक्षेत्र से कनेक्श, कश्मीर द्वापर से भारत का अटूट अंग, कश्मीरी हिंदू प्रकोष्ठ, गीता ज्ञान संस्थानम्, कुरुक्षेत्र-कश्यप तीर्थाटन-2025 कार्यक्रम, कश्मीर में धर्म की पुन: स्थापना, कश्मीरी हिंदुओं के पुनर्वास, कार्यक्रम में सीएम मुख्यातिथि</media:keywords>
<content:encoded><![CDATA[<p>हरियाणा के कुरुक्षेत्र में कश्मीरी हिंदू प्रकोष्ठ की ओर से गीता ज्ञान संस्थानम् में कुरुक्षेत्र-कश्यप तीर्थाटन-2025 कार्यक्रम का आयोजन होगा। इस कार्यक्रम को कश्मीर में धर्म की पुन: स्थापना और कश्मीरी हिंदुओं के पुनर्वास की कामना के निमित्त किया जा रहा है। कार्यक्रम में सीएम नायब सिंह सैनी मुख्यातिथि होंगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता स्वामी ज्ञानानंद करेंगे। कार्यक्रम में कश्मीर का कुरुक्षेत्र से पुराने रिश्ते का दर्शाता नाटक पेश किया जाएगा।</p>
<p>इस 40 मिनट के स्टेज-शो में द्वापर काल से कश्मीर भारत का अखंड और अटूट अंग है, उसे प्रदर्शित किया जाएगा। शाम करीब 4 बजे सीएम कार्यक्रम में पहुंचेंगे। हवन से होगी शुरुआत प्रकोष्ठ के संरक्षक पंकज धर ने बताया कि इस समारोह में जम्मू-कश्मीर, दिल्ली, पंजाब, यूपी, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, चंडीगढ़, हरियाणा समेत देशभर से कश्मीरी हिंदू हिस्सा लेंगे। हवन के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ होगा।</p>
<p> विश्व में न्याय की स्थापना करने वाले भगवान श्रीकृष्ण की धरती पर कश्मीर में दोबारा धर्म की स्थापना और कश्मीरी हिंदुओं के पुनर्वास की कामना करेंगे। कश्मीर का कृष्ण-कुरुक्षेत्र से नाता प्रवक्ता संजय गारू ने बताया कि महाभारत युद्ध से पहले स्वयं भगवान श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र से चलकर रानी यशोमती का राजतिलक करने के लिए कश्मीर आए थे।</p>
<p>महाभारत युद्ध कश्मीर अकेला राज्य था, जिसने किसी भी तरह से युद्ध में हिस्सा नहीं लिया था। सभ्यता की जड़ों से जुड़ना होगा मीडिया प्रभारी अमित रैना ने बताया कि इस आयोजन का केंद्र कश्मीर की रानी यशोमती हैं। यह उत्सव हमारा सामूहिक संकल्प है। इसके जरिए प्रार्थना करेंगे कि हम अपनी सभ्यता की जड़ों का सम्मान करें। कश्मीरी हिंदू शांति और गरिमा के साथ अपने घर लौट सकें।</p>]]> </content:encoded>
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<title>पहला मंदिर जहां चौबीसों घंटे शिवलिंग पर बहेगी गंगा धारा:कुरुक्षेत्र संगमेश्वर में 4000 लीटर के टैंक की एप से निगरानी, हरिद्वार से आएगा गंगाजल</title>
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<description><![CDATA[ कुरुक्षेत्र के एक हजार साल से ज्यादा पुराने संगमेश्वर महादेव मंदिर अरुणाय में अब शिवलिंग पर चौबीसों घंटे गंगाजल की धार बहेगी। सावन के आखिरी दिन शुक्रवार को यह व्यवस्था शुरू हो गई।मंदिर में आने वाले श्रद्धालु भी भगवान को गंगा जल अर्पित कर सकेंगे। इसके लिए मंदिर में मॉडर्न टैंक सिस्टम लगाया गया है। ]]></description>
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<pubDate>Fri, 08 Aug 2025 18:40:49 +0530</pubDate>
<dc:creator>Latest News</dc:creator>
<media:keywords>चौबीसों घंटे, शिवलिंग पर बहेगी गंगा धारा, कुरुक्षेत्र संगमेश्वर, 4000 लीटर के टैंक, हरिद्वार से आएगा गंगाजल</media:keywords>
<content:encoded><![CDATA[<p>कुरुक्षेत्र के एक हजार साल से ज्यादा पुराने संगमेश्वर महादेव मंदिर अरुणाय में अब शिवलिंग पर चौबीसों घंटे गंगाजल की धार बहेगी। सावन के आखिरी दिन शुक्रवार को यह व्यवस्था शुरू हो गई।मंदिर में आने वाले श्रद्धालु भी भगवान को गंगा जल अर्पित कर सकेंगे। इसके लिए मंदिर में मॉडर्न टैंक सिस्टम लगाया गया है। इस सिस्टम में 1500-1500 लीटर के 2 टैंक मंदिर के द्वार पर फिट किए गए हैं। इसके अलावा 1 हजार लीटर की कैपेसिटी वाला टैंक अलग रखा गया है। इस टैंक से शिवलिंग पर लगे कलश को जोड़ा गया है। टैंक से कलश में गंगा जल पहुंचेगा और वहां से शिवलिंग पर गंगा जल की धार बनी रहेगी। इन टैंकों में जल की कैपेसिटी को नापने के लिए भी सिस्टम लगा है। जैसे ही टैंक में जल कम होगा, सिस्टम तुरंत अलर्ट भेज देगा। उसके बाद हरिद्वार में हर की पौड़ी से गंजा जल की सप्लाई पहुंचेगी।</p>
<p>एप से रखी जाएगी नजर गंगा जल के टैंक में गेज सिस्टम लगा है। इस सिस्टम पर मोबाइल एप के जरिए नजर रखी जाएगी। इस एप से टैंक और उसमें मौजूद गंगा जल की सारी जानकारी मैसेज के जरिए ऑटोमैटिक मिलती रहेगी। एप से जल की शुद्धता के बारे में भी पता किया जा सकेगा। एप टैंक में 100 लीटर जल रहने पर अलर्ट देगी। करनाल के श्रद्धालु ने बनाई व्यवस्था मंदिर सेवादल के प्रबंधक भूषण गौतम ने बताया कि करनाल के रहने वाले श्रद्धालु की ओर से पूरा सिस्टम लगाया गया है। श्रद्धालु ने अपना नाम गुप्त रखने की इच्छा जाहिर की है। सिस्टम लगाने के साथ उन्होंने गंगा जल मंदिर तक पहुंचाने की व्यवस्था का भरोसा भी दिया है। मंदिर प्रबंधन सिर्फ उनको टैंक में 200 लीटर जल रहने पर मैसेज देगा। हर की पौड़ी हरिद्वार से लाया गया जल उन्होंने कहा कि हर की पौड़ी हरिद्वार से गंगा जल लाकर टैंकों में डाला गया है। गंगा जल लाने के लिए अलग से गाड़ी का प्रबंध भी श्रद्धालु की तरफ से किया गया है। हरिद्वार से जल लाने में ज्यादा समय भी नहीं लगता है।</p>
<p>कल सुबह उनकी गाड़ी हरिद्वार से जल लेकर आई थी और शाम को जल भरकर लौट आई। निशुल्क मिलेगा गंगा जल प्रबंधक भूषण गौतम ने कहा कि मंदिर में कोई भी श्रद्धालु आकर गंगा जल से शिवलिंग का अभिषेक कर सकेगा। इसलिए टैंक को मंदिर के द्वार पर लगाया गया है। ये व्यवस्था निशुल्क रहेगी। अगर कोई श्रद्धालु मंदिर से गंगा जल अपने साथ लेकर जाना चाहे, तो प्रबंधन की ओर से कोई आपत्ति नहीं है। श्री पंच और सचिव महंत ने किया उद्घाटन मंदिर के सचिव एवं प्रबंधक महंत विश्वनाथ गिरी ने बताया कि शुक्रवार को श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी के सचिव एवं अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी और श्री पंच ने इस टैंक सिस्टम का उद्घाटन किया। उसके बाद से श्रद्धालुओं ने गंगा जल से शिवलिंग का अभिषेक शुरू कर दिया। जानिए संगमेश्वर महादेव मंदिर की कहानी प्रबंधक भूषण गौतम के मुताबिक, संगमेश्वर महादेव स्वयंभू शिवलिंग हैं। पुराने समय में महात्मा गणेश गिरि को घास के बीच एक दीमक का ढेर दिखाई दिया। उन्होंने अपने चिमटे से इस ढेर को कुरेदा तो उनका चिमटा किसी ठोस चीज से टकराया।</p>
<p>उन्होंने मिट्टी को हटाकर देखा तो उन्हें वहां बड़ा सुंदर और तेजस्वी शिवलिंग दिखाई दिया। शिवजी की प्रेरणा से बनाया मंदिर: उन्होंने शिवलिंग को किसी साफ स्थान पर स्थापित करने के लिए उखाड़ना चाहा, मगर शिवलिंग का अंतिम छोर नहीं मिला। वे थक-हारकर रात को सो गए। रात को स्वप्न में उनको शिवलिंग वाली जगह पर मंदिर के निर्माण की प्रेरणा हुई। वे सुबह उस स्थान पर पहुंचे तो शिवलिंग पर नाग लिपटा हुआ था। भगवान शिव की प्रेरणा से मंदिर का निर्माण कराया गया। तभी से मंदिर का जीर्णोद्धार का काम भी चल रहा है। दूध से नहीं निकलता मक्खन: मंदिर में एक और चमत्कार देखने को मिलता है। यहां दूध को बिलोकर उससे मक्खन नहीं निकाला जाता है। अगर कोई कोशिश करता है, तो दूध खराब हो जाता है। साथ ही, मंदिर परिसर में चारपाई या खाट का भी इस्तेमाल नहीं किया जाता है।</p>
<p>मान्यता है कि किसी का बुखार ठीक नहीं हो रहा हो, तो दो दिन मंदिर के भंडारे में भोजन करने से उसका बुखार उतर जाता है। 3 नदियों के संगम से बना संगमेश्वर: संगमेश्वर धाम अरुणा, वरुणा और सरस्वती नदी के संगम से बना है। महाभारत, वामन, गरुड़, स्कंद और पद्म पुराण में वर्णित कथाओं में इसका प्रमाण मिलता है। भगवान शंकर से प्रेरित होकर 88 हजार ऋषियों ने यज्ञ के जरिए अरुणा, वरुणा और सरस्वती नदी का संगम कराया था। इन नदियों के संगम से भोलेनाथ ‘संगमेश्वर महादेव’ के नाम से विश्व विख्यात हुए। हर त्रयोदशी को लगता है मेला: यहां हर महीने की त्रयोदशी पर मेला लगता है, जिसमें हरियाणा समेत पंजाब के श्रद्धालु आते हैं। इसके अलावा महाशिवरात्रि और श्रावण मास में बड़ा मेला लगता है। दो दिन चलने वाले इस मेले में 5 लाख से ज्यादा श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। महीने में 20 हजार से ज्यादा श्रद्धालु मंदिर में जल चढ़ाने और मन्नत मांगने आते हैं।</p>]]> </content:encoded>
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<title>श्रद्धा .भक्तों ने भगवान के रथ को खींचकर कमाया पुण्य:भगवान जगन्नाथ के साथ देवी सुभद्रा व भगवान बलभद्र को विराजित कर निकाली भव्य रथयात्रा</title>
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<description><![CDATA[ भास्कर न्यूज | अम्बाला श्रीकृष्ण भक्ति प्रचार समिति व ट्रस्ट मंदिर श्री राधे श्याम सोसाइटी ने पहली बार भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकाली। इसमें भक्तों ने श्रद्धा और उत्साह के साथ भाग लिया। रथयात्रा का शुभारंभ श्री राधे श्याम मंदिर नजदीक पुराना सिविल अस्पताल के पास से हुआ। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 28 Jun 2025 08:41:31 +0530</pubDate>
<dc:creator>Latest News</dc:creator>
<media:keywords>भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा</media:keywords>
<content:encoded><![CDATA[<p>भास्कर न्यूज | अम्बाला श्रीकृष्ण भक्ति प्रचार समिति व ट्रस्ट मंदिर श्री राधे श्याम सोसाइटी ने पहली बार भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकाली। इसमें भक्तों ने श्रद्धा और उत्साह के साथ भाग लिया। रथयात्रा का शुभारंभ श्री राधे श्याम मंदिर नजदीक पुराना सिविल अस्पताल के पास से हुआ। यह शहर के विभिन्न बाजारों से होते हुए जगाधरी गेट, पटेल रोड, दाल बाजार, सर्राफा बाजार, कोतवाली बाजार, बस्ती राम बाजार से वापस मंदिर में आकर समाप्त हुई। रथयात्रा का शुभारंभ अनिल भटनागर और अनुभव अग्रवाल ने किया।</p>
<p>रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ का रथ बड़ा ही भव्य तैयार कराया गया, जिसमें भगवान जगन्नाथ के साथ देवी सुभद्रा, भगवान बलभद्र भी विराजित रहे। बड़ी संख्या में भक्तों ने भगवान के रथ को खींचकर पुण्य कमाया। यात्रा में संकीर्तन करते हुई भजन मंडली ने अलग ही भक्तिमय माहौल तैयार कर दिया था, जिसकी धुन पर हर कोई झूमता नजर आया। साथ ही रथयात्रा में बैंड-बाजे और जुगल किशोर आकर्षण का केंद्र रहे। यात्रा के बाद भगवान जगन्नाथ को छप्पन भोग निवेदित करके प्रसाद वितरण किया गया। कैंट में श्री भक्त बांधव सोसाइटी ने कराधान में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकाली।</p>
<p>यात्रा में स्वयं जगन्नाथपुरी से पधारे भगवान जगन्नाथ, बलदेव एवं सुभद्रा के साथ सुदर्शन चक्र विद्यमान थे। श्री कुंजबिहारी गौड़ीय मठ की ओर से इस शोभायात्रा का आयोजन हर साल किया जाता है। यात्रा का शुभारंभ श्रीपाद भक्ति वेदांत सिद्धांत महाराज के दिशा निर्देश पर वृंदावन से आए श्रीपाद वासुदेवदास, श्रीपाद केशवदास एवं श्रीपाद ब्रज प्रभु द्वारा किया गया। सबसे पहले जगन्नाथ के सामने सर्जन किया गया। नृत्य एवं कीर्तन से उनका स्वागत किया गया। पूरा गांव हरे कृष्ण महामंत्र और हरि बोल की ध्वनि से गूंज उठा। भक्तों ने श्री जगन्नाथ जी के रथ का दर्शन प्राप्त किया। महाराज ने कहा कि जो भगवान जगन्नाथ को रथ पर विराजित हुए देखते हैं उनको जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है।श्री जगन्नाथ भगवान जी के विशेष स्वरूप हैं। रथयात्रा में दिल्ली, फरीदाबाद, चंडीगढ़, अम्बाला के भक्तों ने भाग लिया। यात्रा के बाद भगवान जगन्नाथ को छप्पन भोग निवेदित करके प्रसाद वितरण किया गया।</p>]]> </content:encoded>
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<title>पूंडरी में अग्नि कुंडों के बीच बुजुर्ग साध्वी की तपस्या:42 डिग्री तापमान में 41 दिन का तप, सुख&#45;शांति की कामना</title>
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<description><![CDATA[ हरियाणा के कैथल जिले के पूंडरी में एक अनूठी तपस्या चल रही है। यहां के मां भद्रकाली मंदिर में साध्वी सरस्वती पूरी पंचाग्नि तपस्या कर रही हैं। यह तपस्या 7 मई से 16 जून तक चलेगी। साध्वी पांच अग्नि कुंडों के बीच बैठकर तपस्या करती हैं। वे गांव की सुख-शांति के लिए यह कठिन तप कर रही हैं। ]]></description>
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<pubDate>Thu, 05 Jun 2025 14:05:04 +0530</pubDate>
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<content:encoded><![CDATA[<p>हरियाणा के कैथल जिले के पूंडरी में एक अनूठी तपस्या चल रही है। यहां के मां भद्रकाली मंदिर में साध्वी सरस्वती पूरी पंचाग्नि तपस्या कर रही हैं। यह तपस्या 7 मई से 16 जून तक चलेगी। साध्वी पांच अग्नि कुंडों के बीच बैठकर तपस्या करती हैं। वे गांव की सुख-शांति के लिए यह कठिन तप कर रही हैं। दूर-दूर से पहुंच रहे श्रद्धालु पूंडरी में इन दिनों तापमान 42 डिग्री से ऊपर दर्ज किया जा रहा है। साध्वी दोपहर में सूर्य सिर पर होने पर तपस्या शुरू करती हैं। इस अनूठी तपस्या को देखने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। दर्शन करने आए श्रद्धालुओं राहुल और सोमवती ने बताया कि साध्वी सरस्वती पूरी की यह तपस्या 41 दिन तक चलेगी। पंचाग्नि तपस्या को हिंदू धर्म में सबसे कठिन तपस्याओं में से एक माना जाता है। साध्वी भी चर्चा का केंद्र बनी जानकारी के लिए बता दे कि यह सबसे बुजुर्ग साध्वी है। इन दिनों हरियाणा में अलग अलग साधु संत तपस्या पर बैठ रहे है। कोई 16 साल की साध्वी तो कोई नौजवान साधु। उन सब के बीच यह साध्वी भी चर्चा का केंद्र बनी हुई है। सबसे उम्रदराज साध्वी 41 दिन तक पांच अग्नि कुंडों के बीच रहेगी।</p>]]> </content:encoded>
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<title>जींद में पिंडारा तीर्थ पर श्रद्धालुओं ने लगाई डुबकी:वैशाख अमावस्या पर किया पितृ तर्पण, सुबह 4 बजे से जुटने लगी भीड़</title>
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<description><![CDATA[ हिंदू पंचांग के अनुसार आज अप्रैल माह की वैशाख अमावस्या है। वैशाख अमावस्या पर श्रद्धालुओं ने जींद के पिंडारा तीर्थ पर स्नान के बाद पिंडदान किया और पूर्वजों को तर्पण किया। अमावस्या तिथि रविवार देर रात 1 बजकर 1 मिनट तक रहेगी। आज रात 12 बजकर 19 मिनट तक प्रीति योग रहेगा। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 27 Apr 2025 11:54:52 +0530</pubDate>
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<content:encoded><![CDATA[<p>हिंदू पंचांग के अनुसार आज अप्रैल माह की वैशाख अमावस्या है। वैशाख अमावस्या पर श्रद्धालुओं ने जींद के पिंडारा तीर्थ पर स्नान के बाद पिंडदान किया और पूर्वजों को तर्पण किया। अमावस्या तिथि रविवार देर रात 1 बजकर 1 मिनट तक रहेगी। आज रात 12 बजकर 19 मिनट तक प्रीति योग रहेगा। साथ ही रात 12 बजकर 39 मिनट तक अश्विनी नक्षत्र रहेगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार अमावस्या के दिन इन कामों को करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।</p>
<p>साथ ही पितरों की कृपा से जीवन में सुख व समृद्धि बनी रहती है। वहीं पितरों के नाराज होने पर अगर वैशाख अमावस्या के दिन पितृ तर्पण किया जाए तो वह बेहद लाभदायी होता है। सुबह 4 बजे ही तीर्थ पर पहुंच गए श्रद्धालु रविवार सुबह 4 बजे से ही बैसाख अमावस्या पर श्रद्धालु सरोवर में स्नान, पिंडदान करने के लिए पहुंच गए थे। पिंडतारक तीर्थ के संबंध में किवदंती है कि महाभारत युद्ध के बाद पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पांडवों ने यहां 12 वर्ष तक सोमवती अमावस्या की प्रतीक्षा में तपस्या की। बाद में सोमवती अमावस के आने पर युद्ध में मारे गए परिजनों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान किया। तभी से यह माना जाता है कि पांडु पिंडारा स्थित पिंडतारक तीर्थ पर पिंडदान करने से पूर्वजों को मोक्ष मिल जाता है।</p>
<p>महाभारत काल से ही पितृ विसर्जन की अमावस्या, विशेषकर सोमवती अमावस्या पर यहां पिंडदान करने का विशेष महत्व है। पितरों को खुश करने के लिए विशेष फलदायी है बैसाख अमावस्या - नवीन शास्त्री जयंती देवी मंदिर के पुजारी नवीन शास्त्री ने बताया कि अमावस्या के दिन पवित्र नदियों में स्नान करने की परंपरा है। अमावस्या के दिन पितरों को जल अवश्य अर्पित करना चाहिए। ऐसा करने से पितरों का आशीर्वाद हमारे जीवन पर बना रहता है। इस दिन पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। पितरों की आत्मा की शांति के लिए व्रत भी रखें और मंत्रों का जाप करें। अंत में अपनी श्रद्धा अनुसार विशेष चीजों का गरीबों को दान करें।</p>]]> </content:encoded>
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<title>महाकुंभ का IITian बाबा हरियाणा का रहने वाला:एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की, कनाडा में 3 लाख की नौकरी छोड़ी, 6 महीने पहले घरवालों से संपर्क तोड़ा</title>
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<description><![CDATA[ उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में चल रहे महाकुंभ में IITian बाबा अभय सिंह खूब सुर्खियों में हैं। अभय ने IIT बॉम्बे से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की। इसके बाद कनाडा जाकर एरोप्लेन बनाने वाली कंपनी में काम किया। हालांकि अचानक वह देश लौटे और कुछ समय बाद घर से गायब हो गए। अभय हरियाणा के झज्जर जिले के रहने वाले हैं। ]]></description>
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<pubDate>Sat, 18 Jan 2025 15:08:05 +0530</pubDate>
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<media:keywords>महाकुंभ का IITian बाबा, एयरोस्पेस इंजीनियरिंग, प्रयागराज, कनाडा, एरोप्लेन बनाने वाली कंपनी में काम किया, अभय हरियाणा के झज्जर जिले, अभय सिंह के इंजीनियर से संन्यासी बनने की कहानी, अभय सिंह का जन्म झज्जर के गांव सासरौली, IIT का एग्जाम क्रैक कर लिया, सब कुछ शिव है, सत्य ही शिव है, शिव ही सुंदर है, उज्जैन कुंभ</media:keywords>
<content:encoded><![CDATA[<p>उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में चल रहे महाकुंभ में IITian बाबा अभय सिंह खूब सुर्खियों में हैं। अभय ने IIT बॉम्बे से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की। इसके बाद कनाडा जाकर एरोप्लेन बनाने वाली कंपनी में काम किया। हालांकि अचानक वह देश लौटे और कुछ समय बाद घर से गायब हो गए। अभय हरियाणा के झज्जर जिले के रहने वाले हैं। उनके पिता कर्ण सिंह वकील हैं और झज्जर बार एसोसिएशन के प्रधान भी रह चुके हैं।</p>
<p> महाकुंभ से जब उनकी वीडियो वायरल हुई तो परिवार को पता चला। हालांकि अब वे इस बारे में ज्यादा बात नहीं करना चाहते। अभय सिंह के इंजीनियर से संन्यासी बनने की कहानी... कोचिंग के लिए कोटा की जगह दिल्ली गया अभय सिंह का जन्म झज्जर के गांव सासरौली में हुआ। वह ग्रेवाल गोत्र के जाट परिवार में जन्मे। अभय ने शुरुआती पढ़ाई झज्जर जिले से की। पढ़ाई में वह बहुत होनहार थे। इसके बाद परिवार उन्हें IIT की कोचिंग के लिए कोटा भेजना चाहता था। मगर अभय ने दिल्ली में कोचिंग लेने की बात कही। IIT बॉम्बे में पढ़ाई, कनाडा में काम किया कोचिंग के बाद अभय ने IIT का एग्जाम क्रैक कर लिया। जिसके बाद उन्हें IIT बॉम्बे में एडमिशन मिल गया।</p>
<p>अभय ने वहां से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में बीटेक की डिग्री ली। इसके बाद डिजाइनिंग में मास्टर डिग्री की। अभय की छोटी बहन कनाडा में रहती है। पढ़ाई पूरी करने के बाद परिवार ने उन्हें अच्छे फ्यूचर के लिए कनाडा भेज दिया। कनाडा में अभय ने कुछ समय एरोप्लेन बनाने वाली कंपनी में काम भी किया। जहां उन्हें 3 लाख सेलरी मिलती थी। लॉकडाउन की वजह से कनाडा में फंसे इसके बाद कनाडा में लॉकडाउन लग गया। जिस वजह से अभय भी कनाडा में ही फंस गए। परिवार का कहना है कि अभय का अध्यात्म में पहले से ही इंटरेस्ट था। लॉकडाउन के दौरान अभय जब अकेला पड़ा तो उसने अपनी जिंदगी के बारे में ज्यादा गंभीरता से सोचना शुरू कर दिया।</p>
<p>घर लौटे तो ध्यान लगाने लगे हालांकि जब लॉकडाउन हटा तो अभय भारत लौट आए। यहां आने के बाद वह अचानक फोटोग्राफी करने लगे। अभय सिंह को घूमने का भी शौक रहा, इसलिए वह केरल गए। उज्जैन कुंभ में भी गए थे। हरिद्वार भी गए। कनाडा से लौटने के बाद अभय घर में ध्यान भी लगाने लगे। परिवार जब उनकी शादी की बात करता तो उसे अच्छा नहीं लगता था। हालांकि उनके मन में क्या चल रहा था, इसका आभास परिवार में किसी को नहीं था। 11 महीने पहले अचानक घरवालों से संपर्क कटा परिवार के मुताबिक 11 महीने पहले अचानक अभय सबके संपर्क से बाहर हो गया। परिवार ने बहुत कोशिश की, लेकिन बात नहीं हो पाई।</p>
<p>वह इतना कहते थे कि कोई जरूरी काम हो तो मैसेज कर दिया करो। हालांकि करीब 6 महीने पहले परिवार को चिंता हुई और अभय से बात करनी चाही तो उन्होंने माता–पिता और बहन का नंबर भी ब्लॉक कर दिया। पिता बोले- वापसी पर तकलीफ होगी, मां संन्यासी बनने से दुखी मीडिया से बातचीत में अभय के पिता ने कहा कि वह बचपन से ही बातें बहुत कम करता था। मगर हमें कभी यह आभास नहीं था कि वह अध्यात्म के रास्ते पर चल पड़ेगा। क्या वह अपने बेटे को घर लौटने के लिए कहेंगे तो इस पर उन्होंने कहा कि मैं कह तो दूंगा लेकिन उसे तकलीफ होगी। उसने अपने लिए जो निर्णय लिया, वही उसके लिए सही है। मैं कोई दबाव नहीं डालना चाहता। वह अपनी धुन का पक्का है। हालांकि इकलौते बेटे के अचानक संन्यास लेने से मां खुश नहीं है।</p>
<p>अभय ने कहा था– मेरा काम परिवार को पसंद नहीं इस मामले में मीडिया ने जब अभय सिंह से बात की थी तो उन्होंने कहा था कि मैं जो करना चाहता था, वह परिवार को पसंद नहीं था। घरवालों की शादी की बात में मेरी कोई रुचि नहीं थी। मैं हमेशा से ही घर छोड़ना चाहता था। इसीलिए मैंने IIT मुंबई से पढ़ाई की। अभय बोले- मेरी भी गर्लफ्रेंड थी एक मीडिया चैनल से अभय सिंह ने अपनी लव लाइफ पर बात करते हुए कहा कि मेरी भी गर्लफ्रेंड हुई।</p>
<p>हम 4 साल के आसपास साथ रहे, लेकिन शादी तक बात नहीं पहुंची। मैं मां-बाप के झगड़ों को देखकर शादी करना ही नहीं चाहता था। क्योंकि जिंदगी में वही सब झगड़े होते। इसलिए सोचा क्या करना है। अच्छा है अकेले रहो और खुश रहो। मुझे ऐसा लगता था कि ऐसे ही लड़ाई झगड़ा करना है तो इससे अच्छा है कि अकेले ही जियो। साइंस के जरिए अध्यात्म को समझ रहा हूं उन्होंने कहा कि अब अध्‍यात्‍म में मजा आ रहा है। मैं साइंस के जरिए अध्यात्म को समझ रहा हूं। इसकी गहराइयों में जा रहा हूं। सब कुछ शिव है, सत्य ही शिव है और शिव ही सुंदर है।</p>]]> </content:encoded>
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<title>जींद में श्रद्धालुओं ने किया पूर्वजों का पिंडदान:साल की अंतिम सोमवती अमावस्या पर उमड़ी भीड़, महाभारत काल से जुड़ी है मान्यता</title>
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<description><![CDATA[ जींद के पिंडारा में स्थित पिंडतारक तीर्थ पर सोमवार को साल की अंतिम सोमवती अमावस्या पर श्रद्धालुओं ने सरोवर में स्नान किया। साथ ही पिंडदान करके तर्पण किया। ऐतिहासिक पिंडतारक तीर्थ पर रविवार को शाम से ही श्रद्धालुओं का आगमन शुरू हो गया था। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 30 Dec 2024 13:52:50 +0530</pubDate>
<dc:creator>Latest News</dc:creator>
<media:keywords>जींद के पिंडारा, पिंडारा में स्थित पिंडतारक तीरसोमवती अमावस्या, श्रद्धालुओं ने सरोवर में स्नान, पिंडदान करके तर्पण किया, ऐतिहासिक पिंडतारक तीर्थ, श्रद्धालुओं, सत्संग और कीर्तन, अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान किया, पांडवों ने 12 साल तक की थी प्रतीक्षा</media:keywords>
<content:encoded><![CDATA[<p>जींद के पिंडारा में स्थित पिंडतारक तीर्थ पर सोमवार को साल की अंतिम सोमवती अमावस्या पर श्रद्धालुओं ने सरोवर में स्नान किया। साथ ही पिंडदान करके तर्पण किया। ऐतिहासिक पिंडतारक तीर्थ पर रविवार को शाम से ही श्रद्धालुओं का आगमन शुरू हो गया था।</p>
<p>रविवार की पूरा रात धर्मशालाओं में सत्संग और कीर्तन आदि का आयोजन चलता रहा। सोमवार को तड़के से ही श्रद्धालुओं ने सरोवर में स्नान तथा पिंडदान शुरू कर दिया जो दोपहर के बाद तक चलता रहा। इस मौके पर दूर दराज से आएं श्रद्धालुओं ने अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान किया और सूर्यदेव को जल अर्पण करके सुख समृद्धि की कामना की। इस दौरान सुरक्षा व्यवस्था के पूरे इंतजाम रहे।</p>
<p> पांडवों ने 12 साल तक की थी प्रतीक्षा पिंडतारक तीर्थ के संबंध में मान्यता है कि महाभारत युद्ध के बाद पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पांडवों ने यहां 12 वर्ष तक सोमवती अमावस्या की प्रतीक्षा में तपस्या की। बाद में सोमवती अमावस के आने पर युद्ध में मारे गए परिजनों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान किया। तभी से यह माना जाता है कि पांडू पिंडारा स्थित पिंडतारक तीर्थ पर पिंडदान करने से पूर्वजों को मोक्ष मिल जाता है।</p>
<p>महाभारत काल से ही पितृ विसर्जन की अमावस्या, विशेषकर सोमवती अमावस्या पर यहां पिंडदान करने का विशेष महत्व है। यहां पिंडदान करने के लिए विभिन्न प्रांतों के लोग श्रद्धालु आते हैं। पिंडारा तीर्थ पर श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए पुलिस बल तैनात किया गया था। सरोवर में नहाते हुए कोई अनहोनी घटना न हो, इसके लिए गोताखोर व किश्ती का विशेष प्रबंध किया गया था।</p>
<p>पुलिसकर्मियों ने मेले में उमड़ी भीड़ को व्यवस्थित करने का काम किया। श्रद्धालुओं ने यहां मेले में खरीदारी की। तीर्थ पर जगह-जगह लोगों ने सामान बेचने के लिए फड़े लगाई हुई थी। जिस पर बच्चों तथा महिलाओं ने खरीदारी की। बच्चों ने जहां अपने लिए खिलौने खरीदे तो वहीं बड़ों ने भी घर के लिए सामान खरीदे।</p>]]> </content:encoded>
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<title>सर्व पितृ अमावस्या पर जींद में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़: पांडू पिंडारा तीर्थ का महत्व</title>
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<description><![CDATA[ हरियाणा के जींद जिले में सर्व पितृ अमावस्या पर पांडू पिंडारा तीर्थ पर श्रद्धालुओं ने पिंडदान किया और पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की। जानें इस तीर्थ का ऐतिहासिक महत्व और पांडवों से जुड़ी मान्यताएँ। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 02 Oct 2024 12:33:28 +0530</pubDate>
<dc:creator>Latest News</dc:creator>
<media:keywords>जींद, पांडू पिंडारा, सर्व पितृ अमावस्या, पिंडदान, श्रद्धालु, पितृ पक्ष, महाभारत, धार्मिक मान्यता, तीर्थ स्थल, श्राद्ध कर्म, भिक्षा, सात्विक भोजन, पितरों की आत्मा, भारत का संस्कृति, पांडवों का इतिहास</media:keywords>
<content:encoded><![CDATA[<p>हरियाणा के जींद जिले में वर्ष 2024 की सर्व पितृ अमावस्या पर बुधवार को जींद के पांडू पिंडारा तीर्थ पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। तीर्थ में स्नान के बाद पिंडदान किया और अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति की कामना की। ऐसा माना जाता है कि सर्व पितृ अमावस्या पर उन लोगों का श्राद्ध कर्म किया जाता है, जिनकी मृत्यु तिथि परिवार के सदस्य भूल जाते हैं। मान्यता है कि अमावस्या के दिन पितरों के नाम पर दान करना बहुत भी फलदायी होता है। श्राद्ध पक्ष बुधवार से समाप्त हो गया। बुधवार सुबह से ही पितरों के तर्पण के लिए पिंडारा तीर्थ पर श्रद्धालु पहुंचने लगे थे। इस दौरान तीर्थ पर प्रशासन की तरफ से पुख्ता प्रबंध किए गए, लेकिन गोहाना रोड पर जाम की स्थिति रही।</p>
<p>पांडवों ने पिंडारा तीर्थ में किए थे पिंडदान माना जाता है कि महाभारत के युद्ध के बाद पितरों के तर्पण के पांडवों ने भी पिंडारा तीर्थ में ही पिंडदान किए थे। हालांकि पांडव यहां 12 साल तक सोमवती अमावस्या के योग का इंतजार करते रहे, लेकिन यह योग नहीं बना। ऐसे में कलयुग में भी लोग यहां पिंडदान करते हैं। पिंडारा तीर्थ के महत्व के बारे में वीरेंद्र पिंडारा ने बताया कि पिंडारा तीर्थ को पिंडतारक सोमतीर्थ व पिंडार्क नाम से जाना जाता है। गया जी के जितना महत्व मान्यता है कि जब पितामाह भीष्म वाणों की शैया पर थे, तब धर्मराज युधिष्ठिर ने उनसे पितरों को मुक्ति के लिए पूछा था।</p>
<p>इस पर भीष्म ने पिंडारा तीर्थ में स्नान कर पिंडदान करने के लिए कहा था। शास्त्रों में बताया गया है कि मंकण ऋषि ने सूर्य के बताने पर अपने पितरों के उद्धार के लिए पिंडारा तीर्थ पर पिंडदान किया था। उन्होंने कहा कि शास्त्रों के अनुसार गया जी में दान का जो महत्व है, वही पिंडारा में है। अन्य हिस्सों से भी पहुंचते है लोग पांडवों ने पितरों के लिए पिंडारा में पिंडदान किया। इससे इसका नाम पांडू पिंडारा पड़ा है। यहां तीर्थ पर प्रदेश के साथ-साथ देश के अन्य हिस्सों से भी लोग पिंडदान करने आते हैं। शास्त्रों के अनुसार एक व्यक्ति अपनी तीन पीढ़ियों के लिए पिंडदान कर सकता है। इसमें पिता, दादा व परदादा शामिल हैं।</p>
<p>दरवाजे से भिखारी को न लौटाए खाली हाथ जयंती देवी मंदिर के पुजारी नवीन शास्त्री ने बताया कि यदि आप किसी कारणवश श्राद्ध पक्ष में श्राद्ध नहीं निकाल पाए, तो भी आप सर्व पितृ अमावस्या दिन श्राद्ध संपन्न कर सकते हैं। इस दिन किसी सात्विक और विद्वान ब्राह्मण को घर पर निमंत्रित करें और उनसे भोजन करने और आशीर्वाद देने की प्रार्थना करें। स्नान करके शुद्ध मन से भोजन बनाए, लेकिन भोजन सात्विक होना चाहिए। सर्व पितृ अमावस्या के दिन अगर आपके घर कोई भी भिखारी आए, तो उसे दरवाजे से खाली हाथ न लौटाए। </p>]]> </content:encoded>
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<title>गणेश चतुर्थी: महत्व, पूजा विधि और भगवान गणेश की कथा</title>
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<description><![CDATA[ गणेश चतुर्थी का पर्व भगवान गणेश की पूजा का प्रमुख अवसर है। जानिए इस त्योहार का महत्व, पूजा विधि, और भगवान गणेश की जन्म कथा के बारे में विस्तार से। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 16 Sep 2024 23:04:35 +0530</pubDate>
<dc:creator>Latest News</dc:creator>
<media:keywords>गणेश चतुर्थी, भगवान गणेश पूजा विधि, धार्मिक त्योहार, भारतीय संस्कृति, पारंपरिक पर्व सामाजिक एकता, जन्म कथा, मोदक, विघ्नेश्वर</media:keywords>
<content:encoded><![CDATA[<h4>प्रस्तावना</h4>
<p>गणेश चतुर्थी एक महत्वपूर्ण हिंदू त्योहार है, जिसे भगवान गणेश के आगमन के लिए मनाया जाता है। यह त्योहार विशेष रूप से भारत के विभिन्न हिस्सों में, खासकर महाराष्ट्र में, धूमधाम से मनाया जाता है। इस लेख में हम गणेश चतुर्थी के महत्व, पूजा विधि, भगवान गणेश की कथाएँ, संस्कृति और आधुनिक समय में इसके स्वरूप के बारे में विस्तार से जानेंगे।</p>
<h3>गणेश चतुर्थी का महत्व</h3>
<p>गणेश चतुर्थी का पर्व हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चौथी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भक्त भगवान गणेश की पूजा करते हैं, जो कि बुद्धि, समृद्धि और विघ्नों के नाशक माने जाते हैं। यह पर्व केवल धार्मिक मान्यता नहीं है, बल्कि यह सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक एकता का भी प्रतीक है।</p>
<h4>धार्मिक महत्व</h4>
<p>भगवान गणेश को सभी विघ्नों का नाशक और सफलता का दाता माना जाता है। इस दिन गणेश जी की आराधना से भक्तों के जीवन में आने वाली सभी कठिनाइयाँ दूर होती हैं। कई लोग नए कार्य की शुरुआत से पहले गणेश जी की पूजा करते हैं, ताकि सफलता सुनिश्चित हो सके।</p>
<h4>सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व</h4>
<p>गणेश चतुर्थी का त्योहार एकता, भाईचारे और प्रेम का संदेश देता है। इस दौरान लोग एकत्रित होकर नृत्य, संगीत, और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं। यह त्योहार विभिन्न समाजों और वर्गों के लोगों को एक साथ लाता है, जिससे सामाजिक समरसता को बढ़ावा मिलता है।</p>
<h3>भगवान गणेश: एक परिचय</h3>
<p>भगवान गणेश, जिन्हें 'गणपति' या 'विघ्नेश्वर' के नाम से भी जाना जाता है, का अवतार समस्त विघ्नों के नाशक और समृद्धि के दाता के रूप में माना जाता है। उनका रूप अद्वितीय है—एक मानव शरीर और हाथी का सिर। उनका यह स्वरूप उनके सभी गुणों का प्रतीक है, जिसमें धैर्य, विवेक और सजगता शामिल हैं।</p>
<h4>जन्म कथा</h4>
<p>भगवान गणेश की उत्पत्ति की कई कथाएँ प्रचलित हैं। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, माँ पार्वती ने अपने स्नान के दौरान अपनी त्वचा से एक प्रतिमा बनाई और उसे जीवनदान दिया। जब भगवान शिव वहां आए, तो उन्होंने उस बालक को रोकने का प्रयास किया, लेकिन भगवान गणेश ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया। इस कारण भगवान शिव ने उसे सिर काट दिया। बाद में, भगवान शिव ने एक हाथी के बच्चे का सिर लगाकर उसे पुनर्जीवित किया।</p>
<h3>गणेश चतुर्थी की तैयारी</h3>
<p>गणेश चतुर्थी के पर्व की तैयारी कई दिन पहले से शुरू होती है। लोग अपने घरों में गणेश जी की मूर्तियाँ स्थापित करते हैं। ये मूर्तियाँ मिट्टी, प्लास्टर ऑफ पेरिस या अन्य सामग्री से बनाई जाती हैं। कुछ भक्त स्वयं अपने हाथों से मूर्तियाँ बनाते हैं, जबकि कुछ लोग बाजार से तैयार मूर्तियाँ खरीदते हैं।</p>
<h4>पूजा की तैयारी</h4>
<p>गणेश चतुर्थी के दिन, भक्त सुबह-सवेरे स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं। इसके बाद वे गणेश जी की मूर्ति को विशेष स्थान पर स्थापित करते हैं। पूजा में आमंत्रित होने वाले भक्तों के लिए भोग, जैसे मोदक, लड्डू, और फल अर्पित किए जाते हैं। फिर मंत्रों का उच्चारण करते हुए विधिपूर्वक पूजा की जाती है।</p>
<h3>पूजा विधि</h3>
<p>गणेश चतुर्थी के दिन पूजा का महत्व अत्यधिक होता है। यहाँ पूजा विधि का संक्षिप्त विवरण दिया गया है:</p>
<ol>
<li><strong>स्थान की सजावट</strong>: पूजा के स्थान को स्वच्छ करें और सुंदर तरीके से सजाएँ।</li>
<li><strong>मूर्ति स्थापना</strong>: गणेश जी की मूर्ति को ध्यानपूर्वक स्थापित करें।</li>
<li><strong>आरती और मंत्र</strong>: आरती करें और गणेश जी के विभिन्न मंत्रों का जाप करें। विशेष रूप से "ॐ गण गणपतये नमः" का जाप करें।</li>
<li><strong>भोग अर्पित करना</strong>: मोदक, लड्डू और अन्य खाद्य सामग्री अर्पित करें।</li>
<li><strong>प्रसाद वितरण</strong>: पूजा के बाद प्रसाद का वितरण करें।</li>
</ol>
<h3>गणेश चतुर्थी का उत्सव</h3>
<p>गणेश चतुर्थी का उत्सव 10 दिनों तक मनाया जाता है। पहले दिन मूर्ति स्थापना होती है, और इसके बाद भक्त भगवान गणेश की आराधना करते हैं। इस दौरान विभिन्न कार्यक्रम आयोजित होते हैं:</p>
<ol>
<li><strong>सांस्कृतिक कार्यक्रम</strong>: नृत्य, संगीत और नाटक का आयोजन किया जाता है।</li>
<li><strong>भजन-कीर्तन</strong>: लोग भजन गाते हैं और भक्ति के भाव में डूब जाते हैं।</li>
<li><strong>समूह पूजा</strong>: कई लोग मिलकर सामूहिक रूप से पूजा करते हैं, जिससे एकता का संदेश मिलता है।</li>
</ol>
<h4>विसर्जन</h4>
<p>गणेश चतुर्थी का अंतिम दिन बहुत ही भावनात्मक होता है। इस दिन भक्त गणेश जी की मूर्ति को जल में विसर्जित करते हैं। यह विसर्जन का अर्थ है कि भगवान गणेश अपने भक्तों से विदाई ले रहे हैं, लेकिन अगले वर्ष फिर से आने का वचन देते हैं।</p>
<h3>भगवान गणेश के प्रतीक</h3>
<p>भगवान गणेश के विभिन्न प्रतीक और उनके अर्थ निम्नलिखित हैं:</p>
<ol>
<li><strong>हाथी का सिर</strong>: बुद्धि और विवेक का प्रतीक।</li>
<li><strong>चार हाथ</strong>: मानवता के चार प्रमुख लक्ष्यों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) का प्रतिनिधित्व।</li>
<li><strong>मोदक</strong>: समृद्धि और सुख का प्रतीक।</li>
<li><strong>एक पैर उठाया हुआ</strong>: चुनौतियों का सामना करने का संदेश।</li>
</ol>
<h3>सामाजिक सेवा और गणेश चतुर्थी</h3>
<p>गणेश चतुर्थी का पर्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक सेवा का भी प्रतीक है। कई संगठनों द्वारा इस समय रक्तदान शिविर, गरीबों के लिए भोजन वितरण, और स्वच्छता अभियान चलाए जाते हैं। यह त्योहार न केवल धार्मिकता को बढ़ावा देता है, बल्कि समाज के लिए भी योगदान करने का अवसर प्रदान करता है।</p>
<h3>गणेश चतुर्थी का आधुनिक स्वरूप</h3>
<p>आजकल, गणेश चतुर्थी के पर्व का स्वरूप बदल गया है। जहाँ पहले यह एक पारिवारिक उत्सव था, वहीं अब यह सामूहिक रूप में मनाया जाता है। पंडालों में बड़े-बड़े समारोह होते हैं, जहाँ सांस्कृतिक कार्यक्रम, नृत्य, और भजन-कीर्तन आयोजित किए जाते हैं। सोशल मीडिया पर भी इस पर्व की धूम देखने को मिलती है, जहाँ लोग अपने अनुभव साझा करते हैं।</p>
<h4>जल प्रदूषण और जागरूकता</h4>
<p>हालांकि गणेश चतुर्थी का उत्सव भव्य होता है, लेकिन इसके साथ जल प्रदूषण की समस्याएँ भी जुड़ी हुई हैं। कई स्थानों पर प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी मूर्तियाँ जल में विसर्जित की जाती हैं, जिससे जल प्रदूषण होता है। इस समस्या के समाधान के लिए कई संगठन अब मिट्टी की मूर्तियाँ बनाने और उसे विसर्जित करने के लिए जागरूकता फैला रहे हैं।</p>
<h3>निष्कर्ष</h3>
<p>गणेश चतुर्थी का पर्व हमें सिखाता है कि हम अपने जीवन में बुराइयों को दूर करके अच्छे कर्म करें। भगवान गणेश की आराधना के माध्यम से हम अपने अंदर की विघ्न-बाधाओं को समाप्त कर सकते हैं। यह पर्व हमें एकता, प्रेम और भाईचारे का संदेश देता है। गणेश चतुर्थी एक ऐसा त्योहार है, जो केवल धार्मिक मान्यता नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक समृद्धि का भी प्रतीक है।</p>
<p>भगवान गणेश का आशीर्वाद सदैव बना रहे, यही कामना करते हैं। गणेश चतुर्थी का यह पर्व हर वर्ष नई प्रेरणा और ऊर्जा प्रदान करता है, जिससे हम अपने जीवन को और भी बेहतर बना सकें।</p>]]> </content:encoded>
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<title>सोमवती अमावस्या पर पिंडारा में उमड़ी भीड़</title>
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<description><![CDATA[ हरियाणा के जींद में पिंडारा तीर्थ पर सोमवार को सोमवती अमावस पर हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं ने तीर्थ में स्नान कर पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान किया। इस दौरान यहां पर मेला भी भरा। इसमें बच्चों के लिए खिलौनों की जमकर खरीददारी की गई। रात को ही लोगों की पांडू पिंड़ारा तीर्थ पर भीड़ लगने लगी थी। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 02 Sep 2024 11:34:23 +0530</pubDate>
<dc:creator>Latest News</dc:creator>
<media:keywords>जींद, में, सोमवती, अमावस्या, पर, पिंडारा, में, उमड़ी, भीड़:दूर-दूर, से, पहुंचे, हजारों, श्रद्धालु, पितरों, के, लिए, किया, पिंडदान, तर्पण</media:keywords>
<content:encoded><![CDATA[<p>हरियाणा के जींद में पिंडारा तीर्थ पर सोमवार को सोमवती अमावस पर हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं ने तीर्थ में स्नान कर पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान किया। इस दौरान यहां पर मेला भी भरा। इसमें बच्चों के लिए खिलौनों की जमकर खरीददारी की गई। रात को ही लोगों की पांडू पिंड़ारा तीर्थ पर भीड़ लगने लगी थी। सुबह स्नान शुरू हुआ। सोमवती अमावस्या का हिंदू धर्म में बहुत महत्व माना जाता है। इस दिन महादेव और मां पार्वती की विशेष पूजा और व्रत करने का विधान है। साथ ही पितरों का तर्पण किया जाता है। माना जाता है कि ऐसा करने से पितृ प्रसन्न होते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है और व्रती को अखंड सौभाग्य, खुशहाली और पितरों का आशीर्वाद मिलता है। पंचांग के अनुसार सोमवती अमावस्या का शिव योग शाम छह बजकर 20 मिनट तक रहेगा।</p>
<p>सिद्ध योग शाम छह बजकर 20 मिनट से लेकर पूर्ण रात्रि तक रहेगा। ऐसा कहा जाता है कि इस दौरान मांगलिक कार्य करने से उनमें सफलता प्राप्त होती है और परिवार में खुशहाली आती है। सुबह ही लोग पिंडारा में स्नान के लिए पहुंचने लगे थे। इस कारण जींद-गोहाना मार्ग पर जाम की स्थिति बनी रही। ट्रैफिक व्यवस्था पूरी तरह से फेल नजर आई। 2024 में अमावस्या का तीसरा योग दिसंबर में वर्ष 2024 में सोमवती अमावस्या के पूरे साल में 3 योग की बने हैं। पहला योग 8 अप्रैल को था। दूसरा योग आज 2 सितंबर को है। इसके बाद तीसरा और अंतिम योग इस साल के अंत में 30 दिसंबर को बन रहा है।</p>
<p>सोमवती अमावस्या का लोगों को काफी इंतजार रहता है। पिंडारा तीर्थ का यह है महत्व पिंडतारक तीर्थ के संबंध में किदवंती है कि महाभारत युद्ध के बाद पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पांडवों ने यहां 12 वर्ष तक सोमवती अमावस्या की प्रतीक्षा में तपस्या की। बाद में सोमवती अमावस के आने पर युद्ध में मारे गए परिजनों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान किया। तभी से यह माना जाता है कि पांडू पिंडारा स्थित पिंडतारक तीर्थ पर पिंडदान करने से पूर्वजों को मोक्ष मिल जाता है। महाभारत काल से ही पितृ विसर्जन की अमावस्या, विशेषकर सोमवती अमावस्या पर यहां पिंडदान करने का विशेष महत्व है। यहां पिंडदान करने के लिए विभिन्न प्रांतों के लोग श्रद्धालु आते हैं।</p>]]> </content:encoded>
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<title>कुरुक्षेत्र में सोमवती अमावस्या पर उमड़ी भीड़</title>
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<description><![CDATA[ हरियाणा के कुरुक्षेत्र में सोमवती अमावस्या के अवसर पर सोमवार को हरियाणा सहित देश के कई राज्यों के लाखों श्रद्धालुओं ने धर्मनगरी कुरुक्षेत्र के ब्रह्मसरोवर में आस्था की डुबकी लगाई है। इस अवसर पर देशभर से आए श्रद्धालुओं ने सरोवर में स्नान और पिंडदान किया। सोमवती अमावस्या के अवसर पर कुरूक्षेत्र में दान-दक्षिणा का भी विशेष महत्व है। रविवार को ही यहां श्रद्धालु आना शुरू हो गए थे।  सोमवती अमावस्या के अवसर पर धर्मनगरी कुरुक्षेत्र का ब्रह्मसरोवर आस्था से सराबोर रहा। सोमवती अमावस्या पर इस सरोवर में स्नान, दान और पिंडदान का विशेष महत्व है। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 02 Sep 2024 11:34:23 +0530</pubDate>
<dc:creator>Latest News</dc:creator>
<media:keywords>कुरुक्षेत्र, में, सोमवती, अमावस्या, पर, उमड़ी, भीड़:श्रद्धालुओं, ने, ब्रह्म, सरोवर, में, लगाई, डुबकी, पितरों, की, आत्मा, की, शांति, के, लिए, किया, पिंडदान</media:keywords>
<content:encoded><![CDATA[<p>हरियाणा के कुरुक्षेत्र में सोमवती अमावस्या के अवसर पर सोमवार को हरियाणा सहित देश के कई राज्यों के लाखों श्रद्धालुओं ने धर्मनगरी कुरुक्षेत्र के ब्रह्मसरोवर में आस्था की डुबकी लगाई है। इस अवसर पर देशभर से आए श्रद्धालुओं ने सरोवर में स्नान और पिंडदान किया। सोमवती अमावस्या के अवसर पर कुरूक्षेत्र में दान-दक्षिणा का भी विशेष महत्व है। रविवार को ही यहां श्रद्धालु आना शुरू हो गए थे। सोमवती अमावस्या के अवसर पर धर्मनगरी कुरुक्षेत्र का ब्रह्मसरोवर आस्था से सराबोर रहा। सोमवती अमावस्या पर इस सरोवर में स्नान, दान और पिंडदान का विशेष महत्व है।</p>
<p>इस अमावस्या पर पितरों के तर्पण और मोक्ष की कामना लेकर देश भर से बड़ी संख्या मे श्रद्धालु यहां पहुंचे। पंडित विजय भारद्वाज ने कहा कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सोमवती अमावस्या के दिन ब्रह्मसरोवर पर पिंडदान और तर्पण से पितरों को आत्मिक शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। ब्रह्म सरोवर में स्नान के लिए पहुंचे श्रद्धालुओं ने कहा की इस अवसर पर कुरुक्षेत्र के ब्रह्मसरोवर में स्नान करने का धार्मिक महत्व तो है ही साथ में उन्हें आत्मिक शांति भी प्राप्त होती। राजस्थान से आए रामनाथ श्रद्धालु ने कहा कि वह पहले भी आए हैं लेकिन सोमवती अमावस पर आने का सौभाग्य उनको पहली बार मिला है। और उनका मन बहुत ही ज्यादा शांत और प्रसन्न हुआ है।</p>]]> </content:encoded>
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<title>भगवान श्री कृष्ण की बाल लीलाएँ अत्यंत मनोरंजक और दिव्य हैं।</title>
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<description><![CDATA[ भगवान श्री कृष्ण की बाल लीलाएँ अत्यंत मनोरंजक और दिव्य हैं। उनकी जन्मभूमि मथुरा में उनकी पहली लीला, उनके जन्म के समय की घटनाएँ, और उनके बचपन की विभिन्न अद्भुत घटनाएँ भक्तों के हृदय में गहरी छाप छोड़ती हैं। ]]></description>
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<pubDate>Mon, 26 Aug 2024 13:12:12 +0530</pubDate>
<dc:creator>Latest News</dc:creator>
<media:keywords>माखन चोरी की लीला, कालिया नाग का दमन, गोवर्धन पूजा की लीला, रासलीला, कंस का वध, शिव-पार्वती का वरदान, गीता का उपदेश, धर्म की रक्षा, भक्ति का महत्व</media:keywords>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जन्माष्टमी</strong> के अवसर पर भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं का विस्तृत वर्णन अत्यंत प्रेरणादायक और भक्ति से भरपूर होता है। श्री कृष्ण की जीवन यात्रा, उनके दिव्य कार्य और उनकी अनगिनत लीलाएँ भारतीय संस्कृति की धरोहर हैं। यह वर्णन उनकी जीवन की प्रमुख लीलाओं को विस्तार से प्रस्तुत करेगा और भक्तिभाव को उजागर करेगा।</p>
<h3>भगवान श्री कृष्ण की बाल लीलाएँ</h3>
<p>भगवान श्री कृष्ण की बाल लीलाएँ अत्यंत मनोरंजक और दिव्य हैं। उनकी जन्मभूमि मथुरा में उनकी पहली लीला, उनके जन्म के समय की घटनाएँ, और उनके बचपन की विभिन्न अद्भुत घटनाएँ भक्तों के हृदय में गहरी छाप छोड़ती हैं। श्री कृष्ण का जन्म कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को हुआ था, जिसे जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है।</p>
<h4>1. <strong>माखन चोरी की लीला</strong></h4>
<p>श्री कृष्ण की बाल लीलाओं में सबसे प्रसिद्ध लीला माखन चोरी की है। मथुरा के गोकुल गांव में श्री कृष्ण ने छोटी उम्र में ही माखन चोरी की आदत डाली। गोकुल की गोपियाँ श्री कृष्ण की इस आदत से भलीभांति परिचित थीं। एक दिन, श्री कृष्ण और उनके साथियों ने मिलकर माखन की छोटी-छोटी बर्तन चुरा लीं। गोपियाँ जब इस चोरी को पकड़ती थीं, तब श्री कृष्ण अपनी मासूमियत और चुलबुली मुस्कान के साथ उन्हें मोहित कर देते थे। इस लीला से भगवान श्री कृष्ण ने सिखाया कि प्रेम और भक्ति किसी भी नियम और सीमा को पार कर जाती है।</p>
<h4>2. <strong>कालिया नाग का दमन</strong></h4>
<p>एक और प्रसिद्ध लीला कालिया नाग का दमन है। कालिया नाग एक विषधर था जो यमुनापर बहुत ही आतंक मचाता था। उसके विष के प्रभाव से यमुनापार का जल विषाक्त हो गया था। श्री कृष्ण ने इस दुष्ट नाग का दमन करने का निश्चय किया। उन्होंने अपने छोटे से शरीर में ही कालिया नाग के साथ युद्ध किया और उसे यमुनापार से बाहर निकाल दिया। इस कार्य से उन्होंने न केवल यमुनापार को विषमुक्त किया बल्कि भक्तों को यह सिखाया कि भगवान हर बुराई पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।</p>
<h4>3. <strong>गोवर्धन पूजा की लीला</strong></h4>
<p>जब इन्द्रदेव ने गोकुलवासियों को प्रलयंकारी बारिश से तंग किया, तो श्री कृष्ण ने अपनी छोटी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत को उठाकर गोकुलवासियों की रक्षा की। यह लीला भक्ति और अर्चना के एक अद्वितीय उदाहरण को प्रस्तुत करती है। श्री कृष्ण ने दिखाया कि सच्चे भक्त की रक्षा और भगवान की सहायता हमेशा उपलब्ध होती है। गोवर्धन पूजा के माध्यम से भगवान ने यह संदेश दिया कि प्रकृति का सम्मान और धर्म की रक्षा महत्वपूर्ण हैं।</p>
<h3>श्री कृष्ण की युवावस्था की लीलाएँ</h3>
<p>श्री कृष्ण की युवावस्था में भी अनेक लीलाएँ हैं, जो भक्ति और प्रेम की गहराई को व्यक्त करती हैं।</p>
<h4>1. <strong>रासलीला</strong></h4>
<p>रासलीला भगवान श्री कृष्ण की एक विशेष दिव्य लीला है। रासलीला का आयोजन गोकुल में हुआ, जहां श्री कृष्ण ने गोपियों के साथ नृत्य किया। इस लीला में, श्री कृष्ण ने गोपियों के साथ इस तरह से रास किया कि प्रत्येक गोपी को लगा जैसे वह अकेली श्री कृष्ण के साथ नृत्य कर रही है। इस लीलाओं में भक्ति और प्रेम की गहराई को प्रकट किया गया है। श्री कृष्ण की यह लीला दर्शाती है कि भगवान सभी भक्तों के दिलों में निवास करते हैं और उनके प्रति असीम प्रेम व्यक्त करते हैं।</p>
<h4>2. <strong>कंस का वध</strong></h4>
<p>कंस, श्री कृष्ण का मामा था और वह एक दुष्ट शासक था। श्री कृष्ण ने अपने यथार्थ स्वरूप का परिचय देते हुए कंस का वध किया। इस लीलाओं में, भगवान ने दुष्टता और अधर्म का नाश किया और धर्म की पुनर्स्थापना की। श्री कृष्ण के इस कार्य ने यह सिखाया कि धर्म की रक्षा के लिए भगवान हमेशा प्रकट होते हैं और अधर्म का नाश करते हैं।</p>
<h4>3. <strong>शिव-पार्वती का वरदान</strong></h4>
<p>श्री कृष्ण की लीलाओं में एक प्रमुख घटना शिव और पार्वती का वरदान भी है। जब शिव और पार्वती ने श्री कृष्ण से पूछा कि वे उन्हें क्या देंगे, तो श्री कृष्ण ने कहा कि वे उन्हें अपने भक्ति और प्रेम का अनुभव देंगे। इस घटना से यह स्पष्ट होता है कि भगवान श्री कृष्ण का प्रेम और भक्ति सभी देवी-देवताओं के लिए भी महत्वपूर्ण है।</p>
<h3>भगवान श्री कृष्ण की उपदेशात्मक लीलाएँ</h3>
<p>भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं में उनके उपदेशात्मक कार्य भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।</p>
<h4>1. <strong>गीता का उपदेश</strong></h4>
<p>श्री कृष्ण ने महाभारत के युद्ध के समय अर्जुन को भगवद गीता का उपदेश दिया। गीता एक दिव्य संवाद है जिसमें श्री कृष्ण ने अर्जुन को धर्म, कर्म, और भक्ति के महत्व को समझाया। यह उपदेश जीवन के हर पहलू को समझने में सहायता करता है और व्यक्तिगत और आध्यात्मिक उन्नति के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है।</p>
<h4>2. <strong>धर्म की रक्षा</strong></h4>
<p>भगवान श्री कृष्ण ने अपने जीवन के माध्यम से यह संदेश दिया कि धर्म की रक्षा और अधर्म का नाश करना उनकी प्रमुख जिम्मेदारी है। वे समय-समय पर प्रकट होते हैं और अत्याचार और अधर्म के खिलाफ लड़ते हैं।</p>
<h4>3. <strong>भक्ति का महत्व</strong></h4>
<p>श्री कृष्ण की लीलाओं में भक्ति का महत्व भी प्रमुख रूप से दर्शाया गया है। भगवान ने सिखाया कि सच्ची भक्ति और प्रेम के माध्यम से भगवान की प्राप्ति संभव है।</p>
<h3>निष्कर्ष</h3>
<p>भगवान श्री कृष्ण की लीलाएँ एक अद्वितीय और दिव्य अनुभव हैं। उनकी बाल, युवावस्था, और उपदेशात्मक लीलाएँ भक्तों को भक्ति, प्रेम, और धर्म के महत्व को समझने में सहायता करती हैं। श्री कृष्ण की लीलाएँ न केवल भक्ति के मार्ग को प्रकट करती हैं बल्कि जीवन के विभिन्न पहलुओं को भी समझने में मदद करती हैं। जन्माष्टमी के पावन अवसर पर, इन लीलाओं का वर्णन भक्तों के हृदय में प्रेम और भक्ति की ज्योति को प्रज्वलित करता है और जीवन की सही दिशा को दर्शाता है।</p>
<p>भगवान श्री कृष्ण की ये दिव्य लीलाएँ हमारी आस्था, प्रेम और जीवन की सही दिशा को प्रदर्शित करती हैं। जन्माष्टमी पर उनके इन दिव्य कार्यों को याद करना और उनकी पूजा करना, जीवन की सच्ची खुशी और सुकून का मार्ग दर्शाता है।</p>]]> </content:encoded>
</item>

<item>
<title>श्रीराधा के नाम और उनका महत्व</title>
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<description><![CDATA[ श्रीराधा का प्राकट्य भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था। यह विशेष दिन मध्याह्न काल में अभिजित् मुहूर्त और अनुराधा नक्षत्र के योग में आता है। श्रीराधा का जन्म राजा बृषभानु और रानी कीर्तिदा के घर बरसाना में हुआ था। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 25 Aug 2024 06:18:08 +0530</pubDate>
<dc:creator>Latest News</dc:creator>
<media:keywords>श्रीराधाष्टमी, श्रीराधा के नाम और उनका महत्व, व्रज, वृन्दावन, बरसाना</media:keywords>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>श्रीराधाष्टमी: श्रीराधा के प्रति श्रद्धा और व्रजवासियों का विशेष व्यंजन</strong></p>
<p>आज श्रीराधाष्टमी का पावन पर्व है, एक ऐसा दिन जो श्रीराधा की दिव्य उपस्थिति को मान्यता देने का अवसर है। श्रीराधा, जो भक्ति की अवतार हैं और भगवान श्रीकृष्ण की प्रियता का सबसे सुंदर प्रतीक हैं, उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का यह विशेष दिन है। यह दिन हमें श्रीराधा की भक्ति, उनके दिव्य गुण और उनके योगदान की याद दिलाता है। इस लेख में, हम श्रीराधा के महत्व और उनके प्रति भक्ति के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करेंगे, साथ ही साथ राधाष्टमी के अवसर पर व्रज (मथुरा, वृन्दावन) में बनने वाले विशेष व्यंजन "दही अरबी" की विधि भी प्रस्तुत करेंगे।</p>
<h3>श्रीराधा का प्राकट्य और उनका महत्व</h3>
<p>श्रीराधा का प्राकट्य भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था। यह विशेष दिन मध्याह्न काल में अभिजित् मुहूर्त और अनुराधा नक्षत्र के योग में आता है। श्रीराधा का जन्म राजा बृषभानु और रानी कीर्तिदा के घर बरसाना में हुआ था। श्रीराधा को जगत की रचना, पालन और संहार की शक्ति प्रदान की गई है। भगवान श्रीकृष्ण स्वयं श्रीराधा की आराधना करते हैं, और इसीलिए श्रीराधा का नाम ‘राधिका’ भी है, जो उनके श्रीकृष्ण की आराधना का संकेत करता है।</p>
<p>श्रीराधा का महत्व यह है कि वे भगवान श्रीकृष्ण की आत्मा हैं। उनके और श्रीकृष्ण के स्वरूप एक हैं, किंतु लीला के लिए वे दो भिन्न स्वरूपों में प्रकट होते हैं। श्रीकृष्ण ने स्पष्ट रूप से कहा है कि जो व्यक्ति उनकी शरण में आकर उनकी प्रियतम श्रीराधा की शरण में नहीं आता, वह उन्हें प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिए, श्रीराधा की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए उनकी पूजा और भक्ति अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस दिन, विशेष रूप से श्रीकृष्ण और श्रीराधा की उपासना मध्याह्न काल में गंध, पुष्प, धूप, दीप और नैवैद्य से करनी चाहिए।</p>
<h3>श्रीराधा के नाम और उनका महत्व</h3>
<p>श्रीराधा के नामों का स्मरण करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है। श्रीराधा के प्रसिद्ध सोलह नामों का उल्लेख पुराणों में किया गया है:</p>
<ol>
<li><strong>राधा</strong> – प्रेम और भक्ति की प्रतीक।</li>
<li><strong>रासेस्वरि</strong> – रासलीला की देवी।</li>
<li><strong>रासवासिनी</strong> – रासलीला में निवास करने वाली।</li>
<li><strong>रसिकेस्वरि</strong> – रसिकों की देवी।</li>
<li><strong>कृष्णप्राणाधिका</strong> – श्रीकृष्ण की प्राणाधारिणी।</li>
<li><strong>कृष्णप्रिया</strong> – श्रीकृष्ण की प्रिय।</li>
<li><strong>कृष्णस्वरूपिणी</strong> – श्रीकृष्ण का स्वरूप।</li>
<li><strong>कृष्णा</strong> – श्रीकृष्ण की शाश्वत प्रिया।</li>
<li><strong>परमानन्दरूपिणी</strong> – परम आनंद की रूपिणी।</li>
<li><strong>कृष्णवामांगसम्भूता</strong> – श्रीकृष्ण की बाईं अंग से उत्पन्न।</li>
<li><strong>वृन्दावनी</strong> – वृंदावन की निवासी।</li>
<li><strong>वृन्दा</strong> – वृंदावन की वनस्पति।</li>
<li><strong>वृन्दावनविनोदिनी</strong> – वृंदावन के आनंद की स्वरूपिणी।</li>
<li><strong>चन्द्रावली</strong> – चंद्रमा जैसी सुंदरता वाली।</li>
<li><strong>चन्द्रकान्ता</strong> – चंद्रमा की प्रिय।</li>
<li><strong>शरतचन्द्रप्रभानना</strong> – शरत ऋतु की चंद्रमा जैसी प्रकाशमयी।</li>
</ol>
<p>इन नामों का स्मरण करने से भक्तों को दिव्य पुण्य और अनंत सुख प्राप्त होता है। श्रीराधा की उपासना करने से आत्मा को शांति और भक्ति की गहराई प्राप्त होती है।</p>
<h3>राधाष्टमी पर विशेष व्रत और पूजा विधि</h3>
<p>राधाष्टमी के पावन अवसर पर विशेष रूप से श्रीराधा की पूजा की जाती है। इस दिन व्रज (मथुरा, वृन्दावन) में दही अरबी का विशेष व्यंजन बनाया जाता है। यह व्यंजन न केवल स्वादिष्ट होता है, बल्कि इसके निर्माण और सेवन से भक्तों को विशेष पुण्य भी प्राप्त होता है।</p>
<p><strong>दही अरबी की सामग्री और विधि</strong></p>
<p><strong>सामग्री:</strong></p>
<ul>
<li>आधा किलो अरबी</li>
<li>दो कप दही</li>
<li>एक चाय का चम्मच पिसी काली मिर्च</li>
<li>एक चाय का चम्मच गरम मसाला</li>
<li>एक चाय का चम्मच अजवाइन</li>
<li>नमक स्वादानुसार</li>
<li>तलने के लिए घी या तेल</li>
</ul>
<p><strong>विधि:</strong></p>
<ol>
<li>
<p><strong>अरबी की तैयारी:</strong> अरबी को अच्छे से धोकर छील लें। कांटे की सहायता से अरबी को गोंद लें ताकि पकाते समय वह आसानी से पक जाए।</p>
</li>
<li>
<p><strong>तलने की प्रक्रिया:</strong> कड़ाही में इतना तेल गरम करें कि अरबी डूब जाएं। धीमी आंच पर अरबी को तब तक तलें जब तक कि वह पूरी तरह से पक जाएं। फिर उन्हें पेपर नेपकिन पर निकाल लें ताकि अतिरिक्त तेल निकल जाए।</p>
</li>
<li>
<p><strong>दही का मिश्रण तैयार करें:</strong> एक दूसरी कड़ाही में दो बड़े चम्मच तेल डालें। तेल गरम होने पर उसमें अजवाइन डालें। फिर अरबी डालकर भूनें।</p>
</li>
<li>
<p><strong>दही का मिश्रण डालें:</strong> एक बाउल में दही, नमक, काली मिर्च और गरम मसाला फेंट लें। अब इस दही के मिश्रण को अरबी पर डाल दें और तब तक भूनें जब तक कि दही पूरी तरह से सूख जाए।</p>
</li>
<li>
<p><strong>परोसें:</strong> अंत में, कटा हुआ धनिया डालकर परोसें।</p>
</li>
</ol>
<p><strong>निष्कर्ष</strong></p>
<p>श्रीराधाष्टमी का पर्व न केवल भक्ति का दिन है, बल्कि श्रीराधा के प्रति श्रद्धा और भक्ति प्रकट करने का भी एक अवसर है। श्रीराधा के दिव्य गुण, उनके सोलह नाम और उनके प्रति समर्पण हमारे जीवन को धन्य बनाते हैं। इस पावन अवसर पर विशेष व्रत, पूजा और प्रसाद जैसे दही अरबी का निर्माण और सेवन करने से हमें दिव्य पुण्य और आशीर्वाद प्राप्त होता है। हमें इस दिन श्रीराधा की भक्ति में लीन रहकर उनके प्रति श्रद्धा और प्रेम व्यक्त करना चाहिए।</p>]]> </content:encoded>
</item>

<item>
<title>शिव पुराण के अनुसार द्वादश ज्योतिर्लिंग और उनके महत्व</title>
<link>https://ncrmedia.com/%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%B5-%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A3-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%B6-%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%97-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%89%E0%A4%A8%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B5</link>
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<description><![CDATA[ इन द्वादश ज्योतिर्लिंगों की पूजा और नामों का स्मरण करके भक्त न केवल आध्यात्मिक शांति प्राप्त करते हैं, बल्कि उनके जीवन में स्थिरता और समृद्धि भी आती है। भगवान शिव के प्रति समर्पण और भक्ति से जीवन के सभी विघ्न दूर होते हैं और भक्तों को सुख और शांति का अनुभव होता है। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 25 Aug 2024 06:06:05 +0530</pubDate>
<dc:creator>Latest News</dc:creator>
<media:keywords></media:keywords>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>शिव पुराण के अनुसार द्वादश ज्योतिर्लिंग और उनके महत्व</strong></p>
<p>भगवान शिव, जिन्हें भूतभावन और अनेकों रूपों में पूजा जाता है, मनुष्यों के कल्याण के लिए विभिन्न तीर्थों में लिंग रूप से विराजमान हैं। ये ज्योतिर्लिंग उन पुण्य-स्थलों पर प्रकट हुए हैं, जहाँ भक्तों ने समर्पण और भक्ति के साथ उनकी आराधना की। हर एक लिंग एक दिव्य शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है और इनकी पूजा करने से भक्तों को परम कल्याण प्राप्त होता है। यद्यपि शिवलिंगों की कोई सीमा नहीं है, फिर भी द्वादश (12) ज्योतिर्लिंग विशेष महत्व रखते हैं, जिनका वंदन शिव पुराण में विशेष रूप से किया गया है।</p>
<p><strong>द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र</strong></p>
<p>शिव पुराण में द्वादश ज्योतिर्लिंग के नामों का स्तोत्र इस प्रकार वर्णित है:</p>
<p><strong>स्तोत्र:</strong></p>
<p>सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्। उज्जयिन्यां महाकालमोंकारं परमेश्वरम्।।</p>
<p>केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकिन्यां भीमशंकरम्। वाराणस्यां च विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।।</p>
<p>वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारुकावने। सेतुबन्धे च रामेशं घुश्मेशं च शिवालये।।</p>
<p><strong>अर्थ:</strong></p>
<ol>
<li>
<p><strong>सौराष्ट्र (काठियावाड़) में श्रीसोमनाथ</strong> - यह लिंग सौराष्ट्र के काठियावाड़ क्षेत्र में स्थित है और इसे सोमेश्वर के रूप में पूजा जाता है।</p>
</li>
<li>
<p><strong>श्रीशैल पर श्रीमल्लिकार्जुन</strong> - यह लिंग आंध्र प्रदेश के श्रीशैल पर्वत पर स्थित है और मल्लिकार्जुन के रूप में पूजा जाता है।</p>
</li>
<li>
<p><strong>उज्जयिनी में श्रीमहाकाल</strong> - उज्जैन में महाकाल के रूप में स्थित यह लिंग शिव की शक्तिशाली उपस्थिति को दर्शाता है।</p>
</li>
<li>
<p><strong>नर्मदा के बीच श्रीओंकारेश्वर या अमरेश्वर</strong> - नर्मदा नदी के मध्य में स्थित यह लिंग ओंकारेश्वर के नाम से प्रसिद्ध है।</p>
</li>
<li>
<p><strong>हिम से आच्छादित केदारखण्ड में श्रीकेदारनाथ</strong> - उत्तराखंड के केदारनाथ में स्थित यह लिंग हिमालय के पर्वतों में स्थित है।</p>
</li>
<li>
<p><strong>डाकिनी नामक स्थान में श्रीभीमशंकर</strong> - पुणे के पास स्थित भीमशंकर लिंग यहाँ प्रकट हुआ है।</p>
</li>
<li>
<p><strong>वाराणसी में श्रीविश्वनाथ</strong> - काशी (वाराणसी) में स्थित यह लिंग विश्वनाथ के रूप में पूजनीय है।</p>
</li>
<li>
<p><strong>गोदावरी तट पर श्रीत्र्यम्बकेश्वर</strong> - गोदावरी नदी के तट पर त्र्यम्बकेश्वर लिंग स्थित है।</p>
</li>
<li>
<p><strong>चिताभूमि में श्रीवैद्यनाथ</strong> - चिताभूमि में वैद्यनाथ लिंग स्थित है, जिसे वैद्यनाथ के नाम से पूजा जाता है।</p>
</li>
<li>
<p><strong>दारुकावन में श्रीनागेश्वर</strong> - दारुकावन में स्थित यह लिंग नागेश्वर के रूप में पूजा जाता है।</p>
</li>
<li>
<p><strong>सेतुबंध पर श्रीरामेश्वर</strong> - सेतुबंध (राम सेतु) पर स्थित यह लिंग रामेश्वर के रूप में पूजा जाता है।</p>
</li>
<li>
<p><strong>शिवालय में श्रीघुश्मेश्वर</strong> - शिवालय (शिव के स्थान) में स्थित घुश्मेश्वर लिंग यहाँ प्रकट हुआ है।</p>
</li>
</ol>
<p><strong>द्वादश ज्योतिर्लिंग के नाम स्मरण की महिमा</strong></p>
<p>द्वादश ज्योतिर्लिंगों के नामों का स्मरण और इनकी पूजा विशेष महत्व रखती है। इससे संबंधित लाभ और प्रभाव इस प्रकार हैं:</p>
<ol>
<li>
<p><strong>सात जन्मों के पापों का नाश:</strong> जो व्यक्ति प्रात:काल उठकर इन ज्योतिर्लिंगों के नामों का पाठ करता है, उसके सात जन्मों के पाप समाप्त हो जाते हैं। यह एक ऐसा पुण्य कार्य है जो जीवन के पापों को समाप्त करने में सक्षम है और व्यक्ति को आध्यात्मिक शुद्धि प्रदान करता है।</p>
</li>
<li>
<p><strong>कामनाओं की पूर्ति:</strong> जो व्यक्ति इन नामों का पाठ करते हुए विशेष इच्छाओं या कामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करता है, उनकी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि भगवान शिव की कृपा से मनुष्य की इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं।</p>
</li>
<li>
<p><strong>पापों का नाश:</strong> इन ज्योतिर्लिंगों के दर्शन से ही मनुष्य के पाप समाप्त हो जाते हैं। केवल दर्शन करने से ही पापों का नाश हो जाता है और व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त होता है।</p>
</li>
<li>
<p><strong>कर्मों का क्षय:</strong> जिस पर भगवान शिव प्रसन्न होते हैं, उसके शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के कर्म समाप्त हो जाते हैं। भगवान शिव की कृपा से जीवन के सभी कर्मों का फल समाप्त हो जाता है और व्यक्ति को आशीर्वाद प्राप्त होता है।</p>
</li>
</ol>
<p>इन द्वादश ज्योतिर्लिंगों की पूजा और नामों का स्मरण करके भक्त न केवल आध्यात्मिक शांति प्राप्त करते हैं, बल्कि उनके जीवन में स्थिरता और समृद्धि भी आती है। भगवान शिव के प्रति समर्पण और भक्ति से जीवन के सभी विघ्न दूर होते हैं और भक्तों को सुख और शांति का अनुभव होता है।</p>
<p>शिव पुराण में इन ज्योतिर्लिंगों का महत्व अत्यधिक है और इनकी पूजा से प्राप्त पुण्य और फल अनंत हैं। भक्तों को इनकी पूजा विधिपूर्वक करनी चाहिए ताकि वे शिव की अनंत कृपा और आशीर्वाद प्राप्त कर सकें।</p>]]> </content:encoded>
</item>

<item>
<title>श्रीगणेश:  बुद्धि और विद्या के देवता</title>
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<description><![CDATA[ प्राचीन संस्कृत काव्य और शास्त्रों में श्रीगणेश की पूजा का अत्यधिक महत्व बताया गया है। आदि कवि वाल्मीकि ने श्रीगणेश की वंदना करते हुए कहा है कि वह चौंसठ कोटि विद्याओं के दाता हैं और देवताओं के आचार्य बृहस्पति को भी विद्या देने वाले हैं। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 25 Aug 2024 05:49:51 +0530</pubDate>
<dc:creator>Latest News</dc:creator>
<media:keywords>श्रीगणेश की पूजा, श्रीगणेश की पूजा का महत्व, श्री गणेश बुद्धि और विद्या के देवता</media:keywords>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>श्रीगणेश: बुद्धि और विद्या के देवता</strong></p>
<p>श्रीगणेश, जिसे गणपति और विघ्नहर्ता भी कहा जाता है, हिन्दू धर्म में बुद्धि, ज्ञान और समृद्धि के देवता के रूप में पूजा जाता है। उनके नाम में 'गण' का अर्थ है अंकों का समूह, और 'ईश' का अर्थ है स्वामी। इस प्रकार, गणेश का मतलब हुआ 'अंकों का स्वामी' या 'गणों का देवता', और यही कारण है कि उन्हें बुद्धि और विद्या का दाता माना जाता है।</p>
<p><strong>श्रीगणेश की पूजा का महत्व</strong></p>
<p>प्राचीन संस्कृत काव्य और शास्त्रों में श्रीगणेश की पूजा का अत्यधिक महत्व बताया गया है। आदिकवि वाल्मीकि ने श्रीगणेश की वंदना करते हुए कहा है कि वह चौंसठ कोटि विद्याओं के दाता हैं और देवताओं के आचार्य बृहस्पति को भी विद्या देने वाले हैं। वाल्मीकि ने श्रीगणेश को द्विरद, कवि और कवियों की बुद्धि के स्वामी के रूप में वर्णित किया है, और इसलिए उन्होंने श्रीगणेश को प्रणाम किया है। यह दर्शाता है कि गणेशजी की पूजा करने से व्यक्ति को हर प्रकार की विद्या और बुद्धि की प्राप्ति होती है।</p>
<p><strong>श्रीगणेश और बुद्धि: एक योगिक दृष्टिकोण</strong></p>
<p>श्रीगणेश की कृपा से तीव्र बुद्धि और असाधारण प्रतिभा प्राप्त होती है, और इसका वैज्ञानिक और योगिक आधार है। योगशास्त्र के अनुसार, हमारे शरीर में छह चक्र होते हैं, जिनमें सबसे पहला चक्र ‘मूलाधार चक्र’ होता है। मूलाधार चक्र का देवता श्रीगणेश हैं। यह चक्र रीढ़ की हड्डी के मूल में, गुदा से दो अंगुल ऊपर स्थित होता है, और इसमें जीवन की शक्ति अव्यक्त रूप में रहती है।</p>
<p>इस चक्र के मध्य में श्रीगणेश विराजमान होते हैं, और इसे ‘गणेश चक्र’ कहा जाता है। इस चक्र पर ध्यान केंद्रित करने से कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होती है, जो स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा चक्र में प्रविष्ट होकर सहस्त्रार चक्र में परमशिव के साथ मिल जाती है। इस मिलन का अर्थ है सिद्धियों की प्राप्ति। अत: मूलाधार चक्र की सिद्धि प्राप्त करने से असाधारण प्रतिभा प्राप्त होती है।</p>
<p><strong>श्रीगणेश की पूजा के लाभ</strong></p>
<p>श्रीगणेश की पूजा करने से न केवल बुद्धि और विवेक की वृद्धि होती है, बल्कि संपूर्ण जीवन में सकारात्मक बदलाव भी आते हैं। गणेशजी की पूजा का विधान प्राचीन ग्रंथों में बताया गया है और इसे विधिपूर्वक करने से अनेक लाभ प्राप्त होते हैं।</p>
<ol>
<li>
<p><strong>प्रात:काल ध्यान</strong>: विद्या प्राप्ति के इच्छुक व्यक्तियों को प्रात:काल श्रीगणेश का ध्यान और निम्न श्लोक का पाठ करना चाहिए:</p>
<div class="dark bg-gray-950 rounded-md border-[0.5px] border-token-border-medium">
<div class="flex items-center relative text-token-text-secondary bg-token-main-surface-secondary px-4 py-2 text-xs font-sans justify-between rounded-t-md">प्रात: स्मरामि गणनाथमनाथबन्धुं<br>सिन्दूरपूरपरिशोभितगण्डयुग्मम्<br>उद्दण्डविघ्नपरिखण्डनचण्डदण्ड-<br>माखण्डलादिसुरनायकवृन्दवन्द्यम्।।<br>
<ul>
<li>
<p>इसका अर्थ है—“मैं प्रात:काल श्रीगणेश का स्मरण करता हूँ, जो अनाथों के बन्धु हैं और जिनके गाल सिन्दूर से शोभित हैं। वे प्रबल विघ्नों का नाश करने में समर्थ हैं और इन्द्रादि देवताओं द्वारा वन्दनीय हैं।”</p>
</li>
<li>
<p><strong>बुधवार को पूजा</strong>: बुधवार को गणेशजी की पूजा विशेष फलदायी होती है। इस दिन स्नान करके, पीले वस्त्र पहनकर पूजा करें। पूजा स्थल पर गणेशजी की तस्वीर या मूर्ति को पूर्व दिशा में स्थापित करें। उन्हें रोली, चावल, और यदि संभव हो तो दो दूब चढ़ाएं।</p>
</li>
<li>
<p><strong>भोग और अर्चना</strong>: श्रीगणेश को बेसन के लड्डू प्रिय हैं, लेकिन अगर ये उपलब्ध नहीं हैं, तो गुड़ या बताशे का भोग भी चढ़ा सकते हैं। एक दीपक जलाकर धूप दिखाएं और उन्हें एक श्लोक बोलकर मन से प्रार्थना करें:</p>
</li>
<li>
<p><strong>मौली और दूर्वा</strong>: पूजा के बाद एक पीली मौली गणेशजी को अर्पित करते हुए कहें—‘करो बुद्धि का दान हे विघ्नेश्वर।’ उस मौली को माता-पिता या गुरु के पैर छूकर अपने हाथ में बांध लें। श्रीगणेश पर चढ़ी दूर्वा को अपने पास रखें, जिससे एकाग्रता बढ़ती है।</p>
</li>
<li>
<p><strong>गणेश मंत्र</strong>: ‘ॐ गं गणपतये नमः’ इस गणेश मंत्र का 108 बार जाप करने से बुद्धि तीव्र होती है। गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ भी विद्या, बुद्धि, विवेक और एकाग्रता में वृद्धि करता है।</p>
</li>
</ul>
</div>
<div class="flex items-center relative text-token-text-secondary bg-token-main-surface-secondary px-4 py-2 text-xs font-sans justify-between rounded-t-md"></div>
<div class="flex items-center relative text-token-text-secondary bg-token-main-surface-secondary px-4 py-2 text-xs font-sans justify-between rounded-t-md">तोहि मनाऊं गणपति हे गौरीसुत हे।<br>करो विघ्न का नाश, जय विघ्नेश्वर हे।।<br>विद्याबुद्धि प्रदायक हे वरदायक हे।<br>रिद्धि-सिद्धिदातार जय विघ्नेश्वर हे।।<br><br></div>
<div class="flex items-center relative text-token-text-secondary bg-token-main-surface-secondary px-4 py-2 text-xs font-sans justify-between rounded-t-md">
<p><strong>अर्थ:</strong></p>
<ol>
<li>
<p><strong>"तोहि मनाऊं गणपति हे गौरीसुत हे।"</strong></p>
<ul>
<li><strong>अर्थ:</strong> मैं तुम्हारी पूजा करता हूँ, गणपति, जो गौरी के पुत्र (पार्वती के पुत्र) हैं।</li>
</ul>
</li>
<li>
<p><strong>"करो विघ्न का नाश, जय विघ्नेश्वर हे।।"</strong></p>
<ul>
<li><strong>अर्थ:</strong> कृपया मेरे जीवन से सभी विघ्न (अवरोध और बाधाएं) को दूर करें। जय हो विघ्नेश्वर (विघ्नों के नाशक) की।</li>
</ul>
</li>
<li>
<p><strong>"विद्याबुद्धि प्रदायक हे वरदायक हे।"</strong></p>
<ul>
<li><strong>अर्थ:</strong> आप ज्ञान और बुद्धि देने वाले हैं और सभी इच्छाओं को पूरा करने वाले वरदाता हैं।</li>
</ul>
</li>
<li>
<p><strong>"रिद्धि-सिद्धिदातार जय विघ्नेश्वर हे।।"</strong></p>
<ul>
<li><strong>अर्थ:</strong> आप रिद्धि (समृद्धि) और सिद्धि (सफलता) देने वाले हैं। जय हो विघ्नेश्वर की।</li>
</ul>
</li>
</ol>
</div>
<div class="flex items-center relative text-token-text-secondary bg-token-main-surface-secondary px-4 py-2 text-xs font-sans justify-between rounded-t-md">
<p><strong>निष्कर्ष</strong></p>
<p>श्रीगणेश की पूजा न केवल बुद्धि और ज्ञान की प्राप्ति के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह जीवन में सफलता और समृद्धि की प्राप्ति के लिए भी अत्यधिक लाभकारी है। गणेशजी की आराधना करने से व्यक्ति को जीवन की हर मुश्किल का सामना करने की शक्ति मिलती है और उसके जीवन में हर क्षेत्र में समृद्धि आती है। गणेशजी की उपासना से जीवन की सभी बाधाएँ दूर होती हैं और व्यक्ति को एकाग्रता, बुद्धि और विवेक की प्राप्ति होती है, जो उसकी सफलता की कुंजी है।</p>
<p></p>
</div>
</div>
</li>
</ol>]]> </content:encoded>
</item>

<item>
<title>श्रीहरिप्रिया लक्ष्मी जी और भगवान विष्णु की बातचीत: संसार की इच्छाएं और आत्मा की वास्तविकता</title>
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<description><![CDATA[ भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में भी इस बात की पुष्टि की है कि सभी प्राणियों के हृदय में उनकी विशेष स्थिति होती है। गीता (10.20) में श्रीकृष्ण कहते हैं, “अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थित:” अर्थात्, “हे अर्जुन, मैं वासुदेव सम्पूर्ण प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ।” इसी प्रकार, गीता (15.15) में भी कहा गया है, “मैं समस्त प्राणियों के हृदय में अंतर्यामी रूप से स्थित हूँ।” ]]></description>
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<pubDate>Sun, 25 Aug 2024 04:59:52 +0530</pubDate>
<dc:creator>Latest News</dc:creator>
<media:keywords>श्रीहरिप्रिया लक्ष्मी जी, भगवान विष्णु, “अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थित:”, “हे अर्जुन, मैं वासुदेव सम्पूर्ण प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ।</media:keywords>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>श्रीहरिप्रिया लक्ष्मी जी और भगवान विष्णु की बातचीत: संसार की इच्छाएं और आत्मा की वास्तविकता</strong></p>
<p>एक दिन, श्रीहरिप्रिया लक्ष्मी जी ने अपने पति भगवान विष्णु से एक गंभीर मुद्दे पर चर्चा की। उनके मन में एक प्रश्न उठ रहा था, जिसे उन्होंने अपने पति से साझा किया। लक्ष्मी जी ने भगवान विष्णु से कहा, “नाथ! संसार में क्या ऐसा कोई व्यक्ति भी है जो लक्ष्मी की कामना न करता हो? राजा, रंक, छोटे-बड़े सभी लोग चाहते हैं कि लक्ष्मी उनके घर में निवास करें। इसलिए, यह संसार जितना मुझे चाहता है, उतना आपको नहीं चाहता। इस संसार के लोग जितने मेरे भक्त हैं, उतने आपके नहीं हैं। क्या आपको इससे जरा भी दुःख नहीं होता?”</p>
<p>भगवान विष्णु ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया, “प्रिये, तुम इस चराचर जगत की स्वामिनी और वैकुण्ठ के अधिपति की अर्धांगनी हो। तुम्हें इस बात का आश्चर्य क्यों हो रहा है? इस समस्त जगत की सच्चाई यही है कि यह वास्तव में मुझे ही चाहता है। हमारे सिवाय तुम्हें कोई और नहीं चाहता। तुम्हें यह बात समझनी होगी।”</p>
<p>लक्ष्मी जी ने उत्तर दिया, “लेकिन संसार के लोग हर समय लक्ष्मी की प्राप्ति में ही लगे रहते हैं, भगवान की प्राप्ति में नहीं। आप कैसे कह सकते हैं कि हमारे सिवाय तुम्हें कोई और नहीं चाहता?”</p>
<p>भगवान विष्णु ने कहा, “चलो, हमारे साथ पृथ्वी पर चलो, और मैं तुम्हें प्रत्यक्ष रूप से दिखा देता हूँ कि लोगों का वास्तविक स्वभाव क्या है।”</p>
<p>लक्ष्मी जी भगवान के साथ पृथ्वी पर आ गईं। मार्ग में उन्होंने एक शवयात्रा देखी, जिसमें बहुत से लोग ‘राम नाम सत्य है’ का जाप कर रहे थे। भगवान विष्णु ने कहा, “प्रिये, इस शवयात्रा में कुछ चमत्कार दिखाओ।”</p>
<p>लक्ष्मी जी ने तत्काल वहां स्वर्ण की वर्षा कर दी। स्वर्ण की मोहरें आकाश से गिरने लगीं, और देखते ही देखते, गमगीन माहौल में खुशी की लहर दौड़ गई। लोग आश्चर्यचकित होकर हंसने लगे और मोहरें उठाने के लिए लालायित हो गए। शुरू में लोग संकोच में थे, लेकिन जल्दी ही अपने लालच को नियंत्रित नहीं कर पाए। उन्होंने मोहरों को बीनने का प्रयास शुरू कर दिया। सबसे पहले, लोग पैरों से मोहरें इकट्ठा करने लगे। फिर, जब एक व्यक्ति ने हाथों से मोहरें उठाना शुरू किया, तो बाकी लोग भी दौड़कर मोहरें उठाने लगे। अंततः, शव को उठाने वाले चार लोग भी मोहरें इकट्ठा करने लगे, क्योंकि उन्होंने देखा कि बाकी लोग मोहरें बीन रहे थे और वे खुद खाली हाथ रह जाएंगे।</p>
<p>यह दृश्य देखकर लक्ष्मी जी ने भगवान से कहा, “प्रभु, देखा आपने? हमने आपको प्रत्यक्ष रूप से दिखा दिया कि लोग हमें कितना चाहते हैं।”</p>
<p>भगवान विष्णु ने उत्तर दिया, “लक्ष्मी जी, यह देखिए कि जो शव नीचे पड़ा है, वह तुम्हें क्यों नहीं उठा रहा?”</p>
<p>लक्ष्मी जी ने खीज में कहा, “प्रभु, आप कैसी बात कर रहे हैं? यह तो मरा हुआ है, इसे कैसे उठाएगा? इसमें तो प्राण ही नहीं हैं।”</p>
<p>भगवान विष्णु ने समझाया, “इसके हृदय से मैं निकल चुका हूँ, इसलिए यह तुम्हें नहीं उठा रहा। बाकी लोगों के अंतःकरण में मैं आत्मा के रूप में विद्यमान हूँ; इसलिए उनके माध्यम से ही मैं लक्ष्मी को उठा रहा था। इसलिए, मैंने सही कहा था कि मेरे अलावा संसार में तुम्हें कोई नहीं चाहता।”</p>
<h3>भगवान श्रीकृष्ण का संदेश</h3>
<p>भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में भी इस बात की पुष्टि की है कि सभी प्राणियों के हृदय में उनकी विशेष स्थिति होती है। गीता (10.20) में श्रीकृष्ण कहते हैं, “अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थित:” अर्थात्, “हे अर्जुन, मैं वासुदेव सम्पूर्ण प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ।” इसी प्रकार, गीता (15.15) में भी कहा गया है, “मैं समस्त प्राणियों के हृदय में अंतर्यामी रूप से स्थित हूँ।”</p>
<p>सभी प्राणियों के हृदय में जो आत्मा है, वह वास्तव में परमात्मा का अंश है। 'ईश्वर अंश जीव अविनाशी' अर्थात्, जीव परमात्मा का अंश है; प्राणों के रूप में जो ब्रह्म है, वह हृदयकमल में विराजमान है।</p>
<p>गुरुनानकदेव जी ने इस सच्चाई को इस प्रकार व्यक्त किया है—</p>
<p>“पुष्प मध्य ज्यों वास बसत है, मुकुट माहि जस छाई। तैंसे ही हरि बसें निरंतर, घट ही खोजो भाई।।”</p>
<p>इसका अर्थ है कि जैसे पुष्प में सुगंध बसती है और मुकुट में रत्न की चमक होती है, वैसे ही परमात्मा हर प्राणी के हृदय में निरंतर बसते हैं।</p>
<h3>प्राणशक्ति और जीवितता</h3>
<p>परमात्मा की सृष्टि में जो क्रियात्मकता और गत्यात्मकता होती है, उसे प्राणशक्ति कहते हैं। शरीर की चेतना ही प्राण है। जब तक प्राण (ब्रह्म) शरीर में होते हैं, तब तक वह जीवित कहलाता है। प्राणों के निकलते ही शरीर शव कहलाता है। प्राणों के रूप में जो ब्रह्म हृदयकमल में विराजमान होता है, वह निकल जाता है।</p>
<p>मनुष्य क्यों सबसे अधिक अपने-आप से प्यार करता है? इसका उत्तर है कि वह अपनी आत्मा यानी भगवान से ही सबसे अधिक प्यार करता है। लेकिन माया के चश्मे से ढकी आंखों के कारण वह इस सच्चाई को समझ नहीं पाता। इस अज्ञानता के कारण वह भौतिक वस्तुओं और सुखों के प्रति अपनी चाहत को बढ़ाता है, जबकि आत्मा, जो भगवान का अंश है, उसकी सच्ची पहचान और प्रेम की गहराई को नहीं समझ पाता।</p>
<h3>भक्ति और आत्मा का सच्चा प्रेम</h3>
<p>भक्ति का सच्चा रूप यही है कि व्यक्ति अपनी आत्मा की पहचान करे और उसे परमात्मा के साथ जोड़ सके। भक्ति का मार्ग आत्मा की सच्चाई को समझने का है, न कि केवल भौतिक वस्तुओं और लक्ष्मी की प्राप्ति की चाहत का। श्रीहरिप्रिया लक्ष्मी जी की बातचीत से यह सिखने को मिलता है कि सच्ची भक्ति और प्रेम वही है जो आत्मा की पहचान और परमात्मा के साथ एकता को केंद्रित करता है।</p>
<p>जब व्यक्ति अपने अंदर के भगवान को पहचान लेता है, तो उसे बाहरी वस्तुओं की चाहत कम हो जाती है। वह समझ जाता है कि वास्तविक सुख और प्रेम बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि आत्मा की पहचान और परमात्मा के साथ एकता में है। यही वास्तविक भक्ति और प्रेम है, जो हमें दुनिया की भौतिकता से परे जाकर आत्मा की दिव्यता और परमात्मा के साथ एकता की ओर ले जाता है।</p>
<p>भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी की बातचीत के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि संसार की भौतिक वस्तुओं और लक्ष्मी की प्राप्ति से ज्यादा महत्वपूर्ण है आत्मा की पहचान और परमात्मा के साथ एकता। यह सच्ची भक्ति की पहचान है, जो व्यक्ति को वास्तविक प्रेम और संतोष की ओर ले जाती है।</p>
<h3>निष्कर्ष</h3>
<p>श्रीहरिप्रिया लक्ष्मी जी और भगवान विष्णु की बातचीत हमें यह समझाने में मदद करती है कि संसार की भौतिक इच्छाओं से परे, आत्मा की वास्तविकता और परमात्मा के साथ एकता का महत्व कितना अधिक है। भक्ति का असली रूप तब प्रकट होता है जब व्यक्ति अपनी आत्मा की पहचान करता है और परमात्मा के साथ एकता की ओर बढ़ता है। यही सच्चा प्रेम और भक्ति है, जो हमें जीवन के वास्तविक सुख और संतोष की ओर ले जाती है।</p>
<p>इस प्रकार, हमें चाहिए कि हम अपने जीवन में भौतिक वस्तुओं और लक्ष्मी की प्राप्ति की चाहत से परे जाकर आत्मा की सच्चाई को समझें और परमात्मा के साथ एकता की ओर अग्रसर हों। यही सच्ची भक्ति और प्रेम का मार्ग है, जो हमें जीवन की गहराई और आत्मा की वास्तविकता से परिचित कराता है।</p>]]> </content:encoded>
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<item>
<title>श्रीवृंदावन धाम में ठाकुर बांकेबिहारी का दिव्य रूप और उनकी महिमा</title>
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<description><![CDATA[ ठाकुर बांकेबिहारी का स्वरूप और उनकी भक्ति का अद्वितीयता उनकी विशेषताओं में छिपी है। &#039;बांका&#039; का मतलब होता है—टेढ़ा और अनोखा, और &#039;बिहारी&#039; का मतलब है—प्रियतम की एक ही रूप-छवि। इस प्रकार, उनका नाम उनके स्वरूप की विशेषता को स्पष्ट करता है। ]]></description>
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<pubDate>Sun, 25 Aug 2024 03:59:02 +0530</pubDate>
<dc:creator>Latest News</dc:creator>
<media:keywords>ठाकुर बांकेबिहारी, बांकेबिहारी का अद्वितीय स्वरूप, श्रीवृंदावन धाम, श्रीराधा और कृष्ण जी</media:keywords>
<content:encoded><![CDATA[<p><strong>श्रीवृंदावन धाम में ठाकुर बांकेबिहारी का दिव्य रूप और उनकी महिमा</strong></p>
<p>श्रीवृंदावन धाम, भक्ति और प्रेम का अनूठा स्थल, जहाँ ठाकुर बांकेबिहारी का अद्वितीय स्वरूप भक्तों को सम्मोहित करता है। श्री बांकेबिहारी की विशेषता और उनके प्रति भक्तों की श्रद्धा अनंत है। उनके दर्शन से भक्तों को एक विशिष्ट प्रकार की आत्मिक संतोष और प्रेम का अनुभव होता है। इस लेख में हम ठाकुर बांकेबिहारी के अद्वितीय स्वरूप और उनके भक्तिपूर्ण इतिहास पर विस्तार से चर्चा करेंगे।</p>
<h3>ठाकुर बांकेबिहारी की दिव्यता</h3>
<p>ठाकुर बांकेबिहारी, जिनका नाम स्वयं उनके विशेष स्वरूप को दर्शाता है, श्रीवृंदावन धाम में विराजमान हैं। उनका स्वरूप 'बांका' शब्द से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ होता है—टेढ़ा, तिरछा और अनोखा। यह नाम उनके रूप की विशेषता को स्पष्ट करता है। उनकी भक्ति और प्रेम की छवि पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। उनके स्वरूप की विशेषता और उनका व्यक्तित्व एक अद्वितीय अद्भुतता से परिपूर्ण है।</p>
<h3>स्वामी हरिदास जी और उनका अद्वितीय अवतार</h3>
<p>स्वामी हरिदास जी, श्रीराधा की प्रिय सखी ललिता के अवतार माने जाते हैं। उन्होंने संवत् 1560 में 25 वर्ष की आयु में वृंदावन के निधिवन में साधना करने के लिए प्रवेश किया। उनके भक्ति और साधना की शक्ति इतनी महान थी कि श्रीराधा और कृष्ण स्वयं उनके पास आकर उनके भक्तिपूर्ण गीत और संगीत को सुनते थे। स्वामी हरिदास जी का भक्ति संगीत ऐसा था कि इससे प्रभावित होकर श्रीराधा और कृष्ण उनके साथ उनकी गोद में आकर बैठ जाते थे।</p>
<p>स्वामी हरिदास जी की साधना और भक्ति से प्रेरित होकर, श्रीराधा और कृष्ण ने निधिवन में प्रकट होने का निर्णय लिया। इस प्रकार, संवत् 1562 की मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पंचमी को एक दिव्य घटना घटी। स्वामी हरिदास जी ने अपने भक्ति संगीत से निधिवन में एक प्रकाशपुंज उत्पन्न किया, और उसमें श्रीराधा और कृष्ण एक दिव्य रूप में प्रकट हुए।</p>
<p>स्वामी हरिदास जी ने देखा कि श्रीराधा और कृष्ण का अद्भुत रूप संसार की नजरों से परे है। उन्होंने यह महसूस किया कि इस दिव्य रूप को दुनियावी दृष्टि से देखा जाना संभव नहीं है। इसलिए, उन्होंने प्रिया और प्रियतम को एक ही रूप में समाहित होने की प्रार्थना की। उनके अनुरोध पर, श्रीराधा और कृष्ण एक अद्वितीय रूप में 'बांकेबिहारी' के रूप में प्रकट हुए।</p>
<h3>बांकेबिहारी का अद्वितीय स्वरूप</h3>
<p>ठाकुर बांकेबिहारी का स्वरूप और उनकी भक्ति का अद्वितीयता उनकी विशेषताओं में छिपी है। 'बांका' का मतलब होता है—टेढ़ा और अनोखा, और 'बिहारी' का मतलब है—प्रियतम की एक ही रूप-छवि। इस प्रकार, उनका नाम उनके स्वरूप की विशेषता को स्पष्ट करता है।</p>
<p>उनके स्वरूप की विशेषता में निम्नलिखित बिंदुओं पर प्रकाश डाला जा सकता है:</p>
<ol>
<li>
<p><strong>मोर्पंख और पाग</strong>: ठाकुर बांकेबिहारी के सिर पर मोरपंख टेढ़ा होता है। यह उनके स्वरूप की अनोखी विशेषता है, जो उनकी छवि को और भी आकर्षक बनाता है। मोरपंख की टेढ़ी अवस्था और उसकी सजावट उनके सौंदर्य को बढ़ाती है।</p>
</li>
<li>
<p><strong>टेढ़ी चाल</strong>: ठाकुर बांकेबिहारी की चाल भी टेढ़ी और इठलाती हुई होती है। जब वे चलते हैं, तो उनकी चाल में एक विशेष प्रकार की मोहकता और आकर्षण होता है, जो भक्तों को मंत्रमुग्ध कर देती है।</p>
</li>
<li>
<p><strong>फेंटा और बांसुरी</strong>: उनकी कमर में बंधा फेंटा भी टेढ़ा रहता है। इस फेंटा में बांसुरी खोंसी जाती है, जो उनकी भक्ति और संगीत के प्रति समर्पण को दर्शाता है।</p>
</li>
<li>
<p><strong>घुंघराले बाल</strong>: उनके चेहरे पर काली-काली घुंघराली अलकें भी टेढ़ी-मेढ़ी शोभायमान रहती हैं। यह उनकी सुंदरता और अनूठे स्वरूप का हिस्सा है।</p>
</li>
<li>
<p><strong>टेढ़ी लाठी</strong>: ठाकुर की लाठी भी टेढ़ी होती है, और वे उसे हाथ में लेकर भी टेढ़े खड़े रहते हैं। इस प्रकार, उनके स्वरूप में हर चीज की एक अद्वितीयता होती है।</p>
</li>
</ol>
<p>जब ठाकुर बांकेबिहारी अपनी बंकिमा मुद्रा में खड़े होते हैं, तो उनका स्वरूप अत्यंत आकर्षक होता है। उनकी मुद्रा, चाल और स्वरूप इतने मोहक होते हैं कि उनके सामने अन्य सौंदर्य फीका लगने लगता है। यह दृश्य देखकर सारा सौंदर्य का सागर भी सूखने लगता है, और बड़े-बड़े ज्ञानी और ध्यानी भी उनकी भक्ति और सौंदर्य के सम्मोहित हो जाते हैं। यहां तक कि कामदेव भी उनके सामने आत्मसमर्पण कर देता है और सोचता है कि उनके सामने रहने से वह जल जाएगा।</p>
<h3>ठाकुर बांकेबिहारी की भक्ति में समर्पण</h3>
<p>ठाकुर बांकेबिहारी के प्रति भक्तों की भक्ति और श्रद्धा की कोई सीमा नहीं है। उनके स्वरूप और उनकी उपस्थिति में एक ऐसी दिव्यता है, जो भक्तों को एक अद्वितीय अनुभव प्रदान करती है। उनके दर्शन से भक्तों को केवल एक आध्यात्मिक अनुभव नहीं मिलता, बल्कि एक गहन प्रेम और समर्पण की अनुभूति भी होती है।</p>
<p>भक्तों की श्रद्धा और भक्ति ठाकुर बांकेबिहारी की महिमा को चार चांद लगाती है। उनकी भक्ति में समर्पण और प्रेम की अभिव्यक्ति हर भक्त की आत्मा में गहराई से समाई हुई है। ठाकुर बांकेबिहारी के प्रति इस गहरी भक्ति का प्रमाण उनकी उपस्थिति में भक्तों की आस्था और प्रेम में मिलता है।</p>
<p>इस प्रकार, ठाकुर बांकेबिहारी का स्वरूप, उनकी दिव्यता और भक्तों के प्रति उनकी अनुग्रहपूर्ण उपस्थिति श्रीवृंदावन धाम की एक अनमोल धरोहर है। उनका अद्वितीय स्वरूप और भक्ति की गहराई भक्तों को एक अनूठा आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करती है, जो न केवल भक्ति की यात्रा को संतोषजनक बनाती है, बल्कि आत्मिक आनंद और प्रेम की खोज को भी पूरा करती है। ठाकुर बांकेबिहारी की महिमा और उनके प्रति भक्तों की श्रद्धा सदा अमर रहेगी, और उनका स्वरूप हमेशा भक्तों के दिलों में विशेष स्थान बनाए रखेगा।</p>]]> </content:encoded>
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<title>जगन्नाथ यात्रा के लिए समिति सदस्य परमिशन लेने एसपी ऑफिस पहुंचे</title>
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<description><![CDATA[ भास्कर न्यूज | अम्बाला अम्बाला शहर में 17 जुलाई को जगन्नाथ यात्रा का आयोजन किया जा रहा है। लेकिन किसान आंदोलन की वजह से धारा 163 लगने के चलते इस्कॉन प्रचार समिति के प्रधान व सभी सदस्य मंगलवार को यात्रा की परमिशन लेने एसपी ऑफिस पहुंचे। प्रधान ने बताया कि एसीपी ऑफिस से यात्रा निकालने की परमिशन मिल गई है। अब 17 जुलाई को शाम 5 बजे यात्रा निकाली जाएगी। यात्रा के रूट को रंग-बिरंगे झंडों से सजाना शुरू कर दिया गया है। इस्कॉन कुरुक्षेत्र व इस्कॉन प्रचार समिति अम्बाला की तरफ से पिछले 21 सालों से अम्बाला शहर में भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा का आयोजन किया जा रहा है। इस बार 22वीं भगवान जगन्नाथ यात्रा निकाली जाएगी। 2002 में पहली बार भगवान जगन्नाथ यात्रा निकाली गई थी। समिति में संरक्षक अनिल कपूर व विपिन अग्रवाल, चेयरमैन ललित चिटकार, वाइस चेयरमैन एससी झा, अध्यक्ष विभोर गोयल, वरिष्ठ उपाध्यक्ष कृष्ण शक्तिदास, उपाध्यक्ष कैशियर ध्रूव कृष्ण दास व अन्य सदस्य अपना सहयोग दे रहे हैं। ये रहेगा रूट : रेलवे रोड पर हनुमान मंदिर से शुरू होगी समिति के वाइस प्रेसिडेंट नवीन मकौल ने बताया कि शाम 5 बजे भगवान जगन्नाथ रथयात्रा सिटी के रेलवे रोड के हनुमान मंदिर से शुरू होकर कपड़ा मार्केट, देव समाज कॉलेज रोड, शुक्लकुंड रोड, जगाधरी गेट, सिविल हॉस्पिटल चौंक से होते हुए कम्युनिटी सेंटर सेक्टर-7 में देर रात संपन्न होगी। उसके बाद वहां रात 9 बजे विशाल भंडारे का आयोजन किया जाएगा। ]]></description>
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<pubDate>Wed, 17 Jul 2024 13:41:22 +0530</pubDate>
<dc:creator>Latest News</dc:creator>
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